भारत एक बहुत बड़ा देश है और सैकड़ों साल से हम सुनते चले आ रहे हैं की बोली अलग-अलग जगहों पर बदलती रहती है।
1835 में लॉर्ड मैकाले ने अपने देश की इसी विविधता को एक कमी की तरह से दिखाकर इंग्लिश लैंग्वेज में पढ़ाई को अनिवार्य व आकर्षक कर दिया।
इस छोटी सी दिखने वाली योजना से मैकाले ने किस तरह से हमारी मानसिकता को गुलाम बना दिया और हमारे पीढ़ियों को अपनी संस्कृति से दूर कर दिया। और हम अपनी विरासत को भी भूलकर, काफ़ी हद तक उसे दकियानुसी, अंधविश्वास व फिज़ूल समझने लगे।
इसके विपरीत विश्व के अधिकांश देशों में अलग- भाषाओं के लिए केवल एक ही लिपि का प्रयोग किया जाता है। अधिकांश भाषाओं के लिए तो इंग्लिश की रोमन लिपि ही प्रयोग हो रही है।
यद्यपि इस लिपि में बहुत सारी कमियाँ हैँ, लेकिन कोई और विकल्प न होने के कारण ये मज़बूरी में चलती जा रही है।
इसके विपरीत देवनागरी लिपि अपनी ध्वनि सम्मत विशेषताओ के आधार पर, पूरे विश्व की प्रत्येक भाषा को यथावत लिखने व पढ़ने में सर्वोत्तम है।
आज भी हमारे राजनीतिज्ञ अपने क्षेत्रीय फायदों को सर्वोपरि मानते हैँ। वे अपनी भाषा के साथ ही लिपि को भी यथावत बनाए रखने की होड़ में लगे हुए हैँ।
इस विषय पर एक बड़ा लम्बा शोधपारक लेख इंटरनेट पर पढ़ने को मिला है। उसका लिंक नीचे दे रहा हूँ।
https://scroll.in/magazine/821605/thomas-macaulay-and-the-debate-over-english-education-in-india
समस्त राष्ट्रवादी सोच रखने वाले नागरिकों से सविनय अनुरोध है कि वे इसे पूरा पढ़कर विचार करें कि कैसे हमारी भावी पीढ़ियों को apni-2 भाषाओं को एक ही लिपि में पढ़ने लिखने के लिए तैयार कर सकते हैँ।
इस ब्लॉग के विषय को अधिक से अधिक माध्यमों से शेयर व प्रसारित भी करते रहें।