Tuesday, September 21, 2021

अपनी भूलें

 21/9/21


अपनी भूलें


अपनी भूलें

बच्चों को दोहराते

देख दुखी हूँ


पुराने घाव

दोबारा रिसने से

लग रहे हैं


क्या करूँ अब

समझ नहीं आता

व्याकुल बड़ा


लिख कर ही

पीड़ा को कुछ कम

कर लेता हूँ


सच ही कहा

है, बच्चे देखकर

ज़्यादा सीखते


शायद उन्हें

मिल जाएगी थोड़ी

सी सीख आज


और उनके

अपने बच्चे कुछ

सुधर जाएं


क्रोध ही सारी

भूलों की जड़ होती

याद वे रखें


उपाय बस

मौन व मीठे बोल

से ही मिलता


लागू यह है

कमोबेश हरेक

परिवार में


इसी लिए मैं

फ़ेसबुक पर भी

डाल रहा हूँ


मेरी स्टोरी को

अपनी न बनने

दें आप कभी

क्रोध निदान

 क्रोध निदान!


ऐसा कौन है

जो क्रोधित न हुआ

थोड़ा बहुत


शायद कोई

भी नहीं हो सकता

दुनियाँ में तो


दुर्वासा भी तो

न बच सके इस

अभिशाप से


लेकिन फिर

भी सुधरता नहीं

कोई स्वयं ही


क्रोध बुरा है,

क्रोधी नहीं, दें उसे

सहानुभूति


किसी दूसरे

को ही समझाना

उसे पड़ता


और उसके

लिए गोपनीयता

ज़रूरी होती


किसी के नहीं

मिलने पर मुश्किलें

बढ़ती जातीं


तब उसको

सहायता चाहिए

विशेषज्ञ की


आज ये कोई

मुश्किल भी नहीं है

मोबाइल से


संकोच त्यागें

देर भी नहीं करें

बेहतर हों


इस से सभी

का भविष्य उन्नत

अवश्य होगा


सभी अपने

पराए को सादर

है समर्पित


Wednesday, September 1, 2021

ज़िन्दगी खुल कर जिएं

 आज सुबह सपने में मन 

इन शब्दों पर थिरक रहा था😊


आओ   अपनी  ज़िन्दगी  को  खुल  के  हम जिएं।

और   इसके  हर  इक  पल  में   

रंग  ख़ुद  भरें।


क्यों  किसी  की  फ़िक्र  भी  हम  बेवजह  करें।

और  दख़ल  न  हम   किसी  की  ज़िन्दगी  में  दें।


हम  सभी  को  है   बनाया  उसी  एक ने।

और  उसी  का   कोई  रूप   सजा 

है   मन  में।


रूप  वो  सभी  के  मन  में   हैं   अलग  अलग।

और   ये   भी   सच  है   कि   वो   हैं  नहीं   विलग।


कोई  थोड़ा  काला  है   तो  गोरा  कोई  अधिक।

और   सच   है   ये   भी   कि   अन्तर  नहीं   तनिक।


हर   किसी  का   धर्म   औ   मज़हब  जुदा  जुदा।

और    हर   इक    जानता   वो  है   नहीं   जुदा।


क्यों   किसी    बहकावे   में   आकर  के   हम    लड़ें।

और     क्यों    न    मिलके   साथ   प्रेम   से   रहें।


ख़ुद   ही   हम   को   खोजना   है   अपना   रहनुमा।

और   हमेशा   याद   रखना   हों   न   बदगुमां।


हर    मुक़ाम    औ    ख़ुशी   तो  मौजूद   है    यहीं।

और    उसको    पाने    की   है   राह   बस   यक़ीन।


कभी   मन्ज़िल    पास   लगती    है   तो    कभी    दूर।

और    किसी     कोशिश   से   वो    मिलती  है    ज़रूर।


अपने    इरादों    को    हम   मज़बूत    ही   रखें।

और    मुश्किलों   से    तो   कभी   भी     न    डरें।


मिलेगी    कामयाबी    और    ख़ुशियाँ  हमें    अपार।

और    हर   मुक़ाम   पे    पहुँच  के   देंगे   उसे   आभार।


स्थितप्रज्ञ हाइकु

 स्थितप्रज्ञ हों

लगातार प्रयत्न

करते रहें


इस दिशा में

जानना शुरू करें

बचपन से


बदलें उसे

जो है अपने वश

अन्यथा मानें


विवेकशील

होकर अध्ययन

करना सीखें


अपेक्षा और

इच्छा सीमित रखें

श्रम अधिक


स्नेह फैलाएं

क्रोध करें वश में

निरन्तर ही


शिक्षा कम दें

स्वयम कर सिखाएं

प्रगति करें


भूल किसी की

भी सदा क्षमा करें

स्नेह ही देवें


आयु बढ़े तो

साहस-धैर्य बढ़े

लालसा घटे


अपेक्षा कम

करना ही सीखिए

किसी और से


अपने साथ

रहना भी सीखिए

कुछ समय


सुख संतोष

मन के अन्दर ही

न कहीं और


बिना आपकी

स्वीकृति असंभव

अपमान भी


व्यर्थ है चिंता

लोग क्या कहेंगे की

मस्त रहिए


स्वर्ग भी यहीं

पा सकते हैं हम

निर्लिप्त बन