क्या हम अचानक आस्तिक हो गए?
*जब बिहारी जी ने हमें ऊँची छत से पत्थर के फ़र्श पर गिरते समय गोद में लेकर बचाया।*
संयोग या चमत्कार, पाठक स्वयं तय करें।🙏
अपना ये आश्चर्यचकित करने वाला अनुभव शेयर करने का आज मन हुआ है। 👇🏻
(बात 1976 की है, व पृष्ठ भूमि को स्पष्ट करने हेतु थोड़ी लम्बी हो गई है।)
अपने पापा के *घोर नास्तिक/ अनीश्वरवादी व्यक्तित्व, व अचेतन अवस्था में भी, जीवन पर्यन्त, *राम - राम का जवाब रावण - रावण से ही देते रहने वाले*, एवं विशुद्ध आर्य समाज रीतियों को ही मानने के कारण, बचपन में मेरा भी किसी मंदिर/पूजा आदि में सिर्फ़ प्रसाद/मिठाई के लालच में ही जाना होता था।
या फिर जन्माष्टमी/रामलीला वगैरह जैसे अवसरों पर सजावट, के साथ आयोजित होने वाले कवि सम्मलेन, मुशायरे आदि में भी सारे लोग साथ जाया करते थे।
यानि, अपने पापा की ही तरह हम भी घोर नास्तिक हो गए थे।
हमारी जो कुछ भी आस्था, विशेषकर *बिहारी जी के प्रति,* उपजी है, वो हमारी पत्नी के उन पर अटूट विश्वास के ही कारण ही है।
पापा ने तो मम्मी व दादी तक को घर में किसी भी तरह की सनातन या ब्राह्मणों को बुलाकर करने वाली पूजाओं के लिए दृढ़ता से मना कर रखा था। और वे दोनों पापा के कचहरी जाने के बाद ही, *छुपाकर होली, दिवाली या नवरात्री पर नाम मात्र की ही पूजा किया करतीं थीं।*
इसके विपरीत, हमने अपनी पत्नी को उनकी इच्छा-श्रद्धा के हिसाब से, सारी पूजा अर्चना की पूर्ण स्वतंत्रता के साथ ही प्रोत्साहित भी किया था।
कीर्ति ने शादी के बाद ही सबसे पहले हमें अपनी बिहारी जी पर अत्यधिक आस्था, निष्ठा के बारे में बताया था, *कि उनके पापा उन्हें साल में एक बार ज़रूर बिहारी जी के दर्शन कराने के लिए कार से लेकर जाते रहे हैं।*
तब हमने उनसे कहा था कि हम वैसा तो शायद नहीं कर पाएंगे, पर जब भी कहीं आते-जाते पर हमारी ट्रेन मथुरा होकर जाया करेगी, *तो हमेशा जर्नी ब्रेक करके, बिहारी जी के दर्शन ज़रूर कराएंगे।*
यह भी तय हुआ था, कि हम उनके साथ उनकी इच्छानुसार किसी भी मंदिर/पूजा आदि में अवश्य जाएंगे, लेकिन बिना अपनी इच्छा के कहीं प्रणाम आदि नहीं करेंगे।
ऐसे ही किसी अवसर पर, एक बार उन्होंने कहा कि इस बार वृन्दावन नहीं जाएंगे, व सीधी बदायूँ जाने वाली उसी वक़्त मिल रही ट्रेन से चलते हैं।
लेकिन, हमने ही उन्हें समझाया कि *अपना नियम बिना किसी वैध कारण के नहीं तोडना चाहिए।* और हम लोग दोनों छोटे बच्चों के साथ दर्शन करने गए।
हमेशा की तरह ही, हम लोग मंदिर में ऊपर साइड वाले बरामदे में खड़े हुए थे, *जहाँ उनके पुराने वरिष्ठ पुजारी जी हम लोगों को लेकर जाते थे।*
उस दिन आरती शुरू होने पर, अचानक हमारे मन में ये विचार आया कि *जिस मूर्ति के सामने सिर झुकाने को, इतनी भारी भीड़ हमेशा पागलों की तरह धक्का मुक्की करती रहती है, उसके सामने थोड़ा सा सिर झुकाने में क्या तुम कुछ बहुत छोटे हो जाओगे?*
और, तब हमने बड़ी चोरी से, जीवन में पहली बार, *पल भर को पलक झपका कर मन से मानो उन्हें प्रणाम किया था।*
फिर, घर पहुँच कर अगली सुबह को हमारी आँख मम्मी की तेज़ आवाज़ से खुली। वे कह रहीं थीं, *"जल्दी से उठकर छत पर के बंदरों को भगाओ, वह सारे पापड़ खा और बर्बाद कर रहे हैं।"*
हम फ़ौरन लुंगी में ही एक छोटा सा डंडा लेकर छत पर दौड़ते हुए गए। और बंदरों को भगाने के लिए काफ़ी तेज़ी से उनके पीछे दौड़ रहे थे।
भागते-2 हम किनारे तक पहुँच गए और वहाँ से आगे जो एक 6x6 फ़िट की खुली जगह थी, उसकी छोटी सी दीवार से पहले रुक नहीं पाए।
सारे बन्दर तो उस खुली जगह से छलांग लगाकर भाग गए, लेकिन हम उस मुंडेर से टकरा कर, उलटे होकर कमर के बल, कोई 10 फ़िट नीचे पथ्थर के फ़र्श पर गिर पड़े।
लेकिन हमें न तो कोई चोट लगी, और कहीं दर्द भी नहीं हुआ।
मम्मी की घबराहट में लोगों को आवाज़ सुनकर पापा व उनके कई मुवक्किल बाहर के ऑफिस से फ़ौरन आकर हमें उठाने को आगे बढ़े।
पर हमने लेते हुए ही कहा हम बिल्कुल ठीक हैं, और अपने आप ही उठेंगे।
पापा के पूँछने पर अचानक हमारे मुँह से निकला, *"हमें तो बस ये लगा कि बिहारी जी ने ही हमें गोद में लेकर आराम से लिटा दिया था।*
इस पर पापा ने हमें झिड़कते हुए कहा, *"हिष्ट, पागल हो गए हो क्या?"* और, हमने भी बड़े शांत मन से, फ़ौरन ही जवाब दिया, *"हम आपसे बिहारी जी को भगवान वगेरा मानने को बिल्कुल नहीं कह रहे हैं, लेकिन हमें जो लगा बस वही बता रहे हैं।"*
उसके बाद जब हमने पिछली दोपहर वाली चोरी से ज़रा सी देर को पलक झपका कर बिहारी जी को मन में ही प्रणाम करने के लिए आई भावना के बारे में मम्मी, दादी और कीर्ती को बताया, तब कीर्ती ने कहा था, *"आपको तो पहली ही बार में बिहारी जी के साक्षात दर्शन हो गए, और हमें आजतक भी नहीं हो पाए!"*
उसके बाद से ही, हमने कीर्ती द्वारा घर के छोटे से कोने में अनेक देवी - देवताओं की फ़ोटो व मूर्तियों की पूजा में, *श्रद्धा से सिर्फ़ बिहारी जी की फ़ोटो पर ध्यान केंद्रित करके हाथ जोड़ना शुरू कर दिया था।*
यद्यपि, हमने स्वयं कभी भी किसी तरह की पूजा ध्यान आदि नहीं किया है, पर सोते - जागते, जब भी किसी के लिए कुछ अच्छा होने की इच्छा उत्पन्न होती है, *तब मन में उनकी उसी मूर्ति की याद अपने आप आ जाती है।*
पता नहीं, *क्या हम अब आस्तिक हो गए हैं!*