Tuesday, August 30, 2022

नारी पर ही,

नारी पर ही,

आज लिख रहा हूँ,

कुछ हाइकु.


भोली बेचारी,

विश्वास है करती,

जाती है मारी.


ममता ही तो,

उसका गहना है,

व बेड़ियाँ भी.


घर को वह,

इतना महत्व देती,

भूलती सुध.


अपना ध्यान,

तो वो कभी कर ही,

न पाती स्वयं.


बाक़ी सदस्य,

इस समर्पण को,

मूल्य न देते.


मान लेते वे,

अधिकार अपना,

जन्म सिद्ध ही.


आदर उसे,

बहुधा ही न मिले,

जीवन भर.


यहीं पे ज़रा,

विचार ज़रूरी है,

सभी के लिए.


जानते तो हैं,

इस बात को सब,

बचपन से.


फिर भी कभी,

क्यों ध्यान न करते,

स्वयं इस पे?


कमी उसकी,

बेचैन भी करती,

सभी लोगों को.


सर्वस्व वह,

न्योछावर करती,

घर के लिए.


किन्तु बाद में,

एक माला ही आती,

फ़ोटो पे कभी.


समाज में ये,

प्रचलन क्या यों ही,

ठीक मान लें?


नारी को देवी,

क्या सिर्फ़ दिखावे को,

ही कहें सदा?


क्या नारी को ही,

पहल न करनी,

चाहिए स्वयं?


मानें न इसे,

स्वार्थ या भड़काना,

अनावश्यक.


घर में सभी,

विचार करें साँझा,

धैर्य शांति से.


लाभ इसका,

पीढ़ियों को मिलेगा,

बड़ा विशेष.


कम ही होंगे,

घरों में मतभेद,

या झगड़े भी.


प्रगति भी तो,

इसे ही कहते हैं,

सौम्यता सँग.


पुरुषों को भी,

इसके महत्व को,

मानना होगा.


तभी बनेंगे,

भारतीय फिर से,

विश्व प्रसिद्ध.


प्रार्थना ये है,

करबद्ध सभी से,

इसे फैलाएं. ❤️👏🥰


Monday, August 29, 2022

आँखें मूँद के

 आँखें मूँद के,

खग सोच सकता,

बिल्ली नहीं है.


उचित न ये,

किसी मनुष्य हेतु,

कभी कहीं भी.


प्रतीत होने,

वाली समस्याएं भी,

उद्विग्न करें.


ज़िक्र उनका,

ज़रूरी हो जाता है,

परिवार में.


चर्चा उनपे,

खुले मन से शीघ्र,

होनी चाहिए.


अन्यथा वही,

विस्फोट का रूप भी,

ले सकती हैं.


ऐसी स्थिति तो,

किसी घर में कभी,

भी आ सके है.


समझदारी,

हमेशा सावधानी,

में ही होती है.


ध्यान इसका,

रखना ही चाहिए,

हर व्यक्ति को.

पुतला ही तो

 पुतला ही तो,

ग़लतियों का होता,

हर इंसान.


उम्र के साथ,

ही तजुर्बा बढ़ता,

जाता है थोड़ा.


पर शायद,

ये कभी मुक़म्मल,

नहीं हो पाता.


इसीलिए तो,

राय ज़रूरी होती,

है दोस्तों की भी.


उससे कुछ,

तो मदद मिलती,

ही है शायद.


मसला जब,

अंदरूनी हो तब,

ख़ास तौर पे.


इसलिए ही,

इसे सहजता से,

लेना चाहिए.


मक़सद तो,

किसी दोस्त का कभी,

बुरा न होता.


हो सकता है,

फिर भी फ़ौरी तौर,

पे बुरा लगे.


गुज़ारिश ये,

बड़े अदब से है,

आज आपसे.


ग़लत कुछ,

न कीजिये गु्स्से में तो,

किसी के साथ.


किसी भी बात,

पे ज़िन्दगी भर का,

साथ न छोड़ें.


ध्यान ये रखें,

साथ पुराने लोग,

ही होंगे सदा.


फ़ौरी लोगों के,

असली मक़सद,

जल्द न दिखें.


मुमकिन है,

उनके इरादे भी,

नेक नहीं हों.


पैसा तो होता,

ही है इतना बुरा,

किसी के पास.


होए न कोई,

अपना मग़रूर,

इसके लिए.


इसका नशा,

उतरने के बाद,

दुःख ही देता.


देर न करें,

सम्हालने में ज़रा,

भी हालात को.


Wednesday, August 24, 2022

दिल दिमाग़ का फ़र्क़

 फ़र्क़ समझें,

दिल व दिमाग़ का,

अच्छी तरह.


विज्ञान ने तो,

इनकी रचना ही,

समझाई है.


क्या कोई और,

भावनात्मक पक्ष,

भी हैं इनके?


भिन्न कुछ क्या,

उनके अपने ही,

नियंत्रण हैं?


बड़ा कौन है,

दिमाग़ दिल में,

ये समझना.


दिल करता,

संचालित सारे ही,

अंग हमेशा.


मन तक भी,

सुनता है पहले,

दिल की बात.


सफ़लता भी,

किसी काम में मिले,

मनोयोग से.


मनोयोग को,

ही और समझेंगे,

अब फिर से.


जिस काम में,

मन नहीं लगता,

वही टलता.


प्यार भी होता,

है बस दिल से ही,

न दिमाग़ से.


अच्छा या बुरा,

भी तय करता है,

दिल ही सदा.


यादों तक में,

दिल से उतर के,

कोई न रहे.


सफ़लता भी,

दिल लगा के किए,

कार्यों से मिले.


बदला लेना,

तो दिमाग़ चाहता,

न कभी दिल.


चैन न मिले,

बिना बदला लिए,

पल भर को.


ज़िद भी आती,

दिमाग़ में पहले,

किसी बात की.


आक्रोश भी तो,

दिमाग़ बिगाड़ता,

बुरी तरह.


रास्ते ग़लत,

भी दिमाग़ दिखाता,

हमें पहले.


मज़बूरी में,

साथ देना पड़ता,

है दिल को भी.


फिर भी दिल,

बेचैन रहता है,

आशंकाओं से.


ऐसे में हमें,

ध्यान देना चाहिए,

ज़्यादा सोच पे.


नुक्सान ज़्यादा,

ख़ुद को ही देता है,

क्रोध-बदला.


दिमाग़ की ही,

सदा सुनने वाला,

भटकता है.


इसी लिए तो,

सुननी ही चाहिए,

बात दिल की.


ईश्वर भी तो,

रहते दिल में ही,

हम सभी के.

Tuesday, August 23, 2022

भूलें तो होतीं

 भूलें तो होतीं,

सभी में कमोबेश,

कुछ अलग.


दिखें बड़ी ही,

आसानी से औरों की,

अपनी नहीं.


देखें बुराई,

अपनी ही सदा व,

ख़ूबी औरों की.


पढ़ाया तो ये,

स्कूलों में भी गया है,

सदैव से ही.


भूल जाना भी,

है तो एक बुराई,

सभी के लिए.


तो फिर इसे,

एक जैसा ही देखें,

अपनों में भी.


अपने लिए,

कोई और अलग,

नियम न हो.


अपनी कमी,

दूर करने हेतु,

स्वयं मानें तो.


किन्तु औरों से,

उदारता बरतें,

धैर्य के साथ.


ध्यान ये रखें.

आदत बदलना,

मुश्किल होता.


इसी लिए तो,

कभी क्रोधित न हों,

कमियों पर.


घर में यही,

नियम पालन हो,

दंपत्ति द्वारा.


बच्चों के साथ,

ज़्यादा ही ध्यान रखें,

व्यवहार में.


वरना वे तो,

बिगड़ सकते हैं,

बहुत जल्दी.


गाँठ बाँध लें,

इसके पालन की,

यथा शीघ्र ही.

Monday, August 22, 2022

कारण क्या है

 कारण क्या है,

सफ़ल न होने का,

आओ समझें।


शत्रु तो ये हैं,

व्यग्रता और चिंता,

एकाग्रता के।


उसके बिना,

खाना भी न खा सके,

ठीक से कोई।


हर क्षेत्र में,

ज़रूरी होती यही,

सर्व प्रथम।


करते तो हैं,

ख़र्चा व मेहनत,

सभी एक सी।


थोड़ा सा डर,

तो लगता सभी को,

परीक्षाओं से।


छोड़ न भागें,

अधूरा कोई कार्य,

ऐसे पलों में।


लगन से ही,

विश्वास बढ़ता है,

सफ़लता का।


थोड़ी सी और,

कोशिश से मिलती,

है सफ़लता।


नहीं असम्भव,

पाना किसी लक्ष्य को,

ठान लें यदि।

Thursday, August 18, 2022

संबंधों पर

 संबंधों पर,

कुछ लिख गया है,

अचानक ये.


रिश्ते ख़ून के,

बड़े गहरे होते हैं,

सदा के लिए.


उनके बीच,

कटुता या आक्रोश,

अस्थाई होता.


शीघ्र ही सभी,

इसे भूल भी जाते,

सरलता से.


हो नहीं पाता,

ऐसा दंपत्तियों में,

देर तक भी.


भिन्नता बड़ी,

होती उनके बीच,

परिवारों की.


बोलचाल भी,

काफ़ी अलग होती,

हाव भाव में.


मिट न सके,

यह अंतर कभी,

पकी उम्र में.


इस स्थिति में,

व्यग्रता व क्रोध भी,

घातक होते.


कई बार तो,

ये बड़े झगडे भी,

बन जाते हैं.


ऐसे में बच्चे,

कुछ बोल न पाते,

बड़ों के बीच.


हो सकता है,

वह इसे स्वयं ही,

ठीक मान लें.


फिर वे करें,

वैसा ही व्यवहार,

विवाह बाद.


इसके लिए,

दोनों ही बराबर,

ज़िम्मेदार हैं.


एक दूजे को,

स्वीकारना चाहिए,

यथावत ही.


पुरुषों को ये,

समझ ही न आता,

अहंकार में.


इसी कारण,

व्यर्थ मतभेद भी,

जन्म लेते हैं.


उन्ही से कुंठा,

भी पैदा हो जाती है,

ज़्यादा स्त्रियों में.


उनकी चुप्पी,

कई रोगों तक को,

जन्म देती है.


इस तथ्य को,

समझना ही होगा,

देर सवेर.


जितना जल्दी,

जो इसे समझेगा,

उतना अच्छा.


कुछ और भी,

इस पर लिखना,

बेकार होगा.

Monday, August 8, 2022

शराबी-व्यथा

 शराबी-व्यथा


कर्म या नशा,

किसे मैं अपनाऊँ,

बूझ न पाऊँ!


जानता हूँ मैं,

मिटे लाखों नवाब,

इसी द्वंद में।


जाने क्यों फिर,

भी समझा न पाऊँ,

मैं ख़ुद ही को।


ये भी समझूँ,

बड़ी अच्छी तरह,

बचपन से।


नशे से प्यार,

अच्छा बड़ा लगता,

स्थाई न होता।


न ले सके है,

स्थान परिवार का,

नशा कभी भी।


पैसे से नहीं,

ख़रीदा जाता प्यार,

कभी भी कहीं।


देर सवेर,

कमा सकते पैसे,

हम सभी ही।


बुरी आदतें,

या मतलबी दोस्त,

पैसों के यार।


परिवार से,

ही मिल सकता है,

सुख व प्यार।


नशा पैसे का,

भी शराब सा होता,

साथ न देता।


शराबी का तो,

साथ छोड़ देता है,

परिवार भी।


ग़रीबी में भी,

परिवार हमेशा,

साथ निभाता।


लील गई है,

मेरा वृहत ज्ञान,

यही भंवर।


स्वाभिमान भी,

मृतप्राण हो चुका,

न जाने कब।


हाल ये मेरा,

जग ज़ाहिर सा है,

त्रस्त बड़ा हूँ।


पूजा पाठ भी,

सब व्यर्थ हो चुके,

सारे ही मेरे।


खिल्ली उड़ाते,

अब लगते सारे,

मेरे ही दोस्त।


रिश्ते नाते भी,

अब मुझे न भाते,

खिन्न सा रहूँ।


और मैं अभी,

कितना नीचे गिरुँगा,

भयाक्रांत हूँ।


हे मे्रे इष्ट,

मार्ग आप दिखाएं,

शक्ति भी देवें।


गंभीरता से,

आत्मावलोकन मैं,

शीघ्र ही करुँ।


स्वयं के साथ,

परिवार को भी मैं,

सम्हाल सकूँ।

बुराई ही क्यों

 बुराई ही क्यों,

ज़्यादा चर्चित होती,

पशुओं की भी?


समझना ये,

ज़रूरी होता है,

बचपन से।


भूल जाते हैं,

हम अच्छाइयों को,

सभी की जल्दी।


किन्तु एक भी,

बुराई याद रहे,

हमेशा हमें।


पशुओं का तो,

हाल और बुरा है,

मुहावरों में।


कुत्ते की पूँछ,

और गधे की अक़्ल,

को ही देख लें।


याद न आती,

उनकी वफ़ादारी,

या मेहनत।


हर पशु से,

सीख सकते हम,

अच्छा भी कुछ।


चीते की फुर्ती,

और शेर का धैर्य,

भी अद्भुत है।


वफ़ादारी में,

कुत्ते घोड़ों का ही तो,

बखान हुआ।


इसी तरह,

हर व्यक्ति में खोजें,

उसके गुण।


आलोचना से,

बुराइयाँ बढ़तीं,

इसे समझें।


किन्तु गुणों में,

वृद्धि होती है सदा,

प्रशंसा से ही।


फ़र्क़ समझें,

भूल अपराध का,

सभी में सदा।


भूलें क्षम्य हैं,

समझाएं धैर्य से,

अपराधों को।


कुत्ता पालना,

बहुत सिखा सके,

हर युवा को।


धैर्य प्रेम का,

वह अनुभव ही,

अमूल्य होता।


ऐसे दंपत्ति,

ही सृजित करेंगे,

सुखी घरों को।


क्रोध या घृणा,

अपमान तिरस्कार,

वहाँ न होंगे।


इसी प्रकार,

संस्कार परिष्कृत,

होते जाएंगे।


अन्यत्र यह,

शिक्षा मिलेगी नहीं ,

बच्चों को कभी।


हानि नहीं है,

जब भी सीख सके,

कोई इसको।

Thursday, August 4, 2022

कुत्ते की पूँछ

 कुत्ते की पूँछ,

में क्या बुराई होती,

आओ समझें।


कटे बिना वो,

सीधी हो ही न सके,

जीवन भर।


नहीं दिखती,

अपनी कोई बुराई,

किसी को भी।


लगे अच्छी ही,

हमें वह हमेशा,

यही समस्या।


ज़िद क्रोध भी,

हमें नहीं छोड़ते,

ठीक वैसे ही।


नहीं सुनते,

हम बात किसी की,

अहंकार में।


टोंकने पर,

और ज़िद बढ़ती,

बुरी तरह।


समझाना भी,

ज़हर सा लगता,

अपनों का भी।


अंत में हम,

रह जाते अकेले,

दुःखी उदास।


जब भी इसे,

समझ लेंगे हम,

सुख बढेगा।


बुढ़ापे में तो,

इसे बदल पाना,

असंभव है।


अच्छा यही है,

इसे जल्दी समझें,

अपने आप।


बच्चे तो बस,

सीखेंगे हमसे ही,

अच्छा या बुरा।


निर्णय जो भी,

हमारे होंगे आज,

कल दिखेंगे।


पछतावे से,

मिलेगा कुछ नहीं,

हमें बाद में।