Sunday, October 2, 2022
क्या हम अचानक आस्तिक हो गए?
उहापोह क्या?
Thursday, September 15, 2022
सामंजस्य
Sunday, September 11, 2022
ख़ुशनुमाँ ही
Friday, September 9, 2022
पीढ़ी अन्तर?
देखा ख़्वाब क्या,
कल रात अजीब,
हक़ीक़त सा.
सभी के बीच,
पिता के बाल सखा,
सँग मैं भी था.
मान व डर,
में क्या होता प्रमुख,
पिता पुत्र में?
यही था चर्चा,
का मौलिक विषय,
तीनों के बीच.
उन्होंने कहा,
मान, किन्तु डर था,
मेरा कहना.
कुछ देर में,
वे भी समझ गए,
मेरी बातों को.
उन्होंने कहा,
उन्हें ऐसा व्यवहार
मिला जन्म से.
और वो बनी,
उनकी भी आदत,
बड़े होकर.
तभी ये सोचा,
क्या मैं कुछ सुधरा,
जीवन भर!
पीढ़ियों से ही,
ये आदत बढ़ती,
चली जा रही.
बच्चे भी ढीठ,
बड़े होते जा रहे,
उत्तरोत्तर.
सुनते तो हैं,
वो सारी बातें किन्तु,
करें मन की!
परिवारों में,
बढ़ती जा रही है,
अदृश्य दूरी.
मनन भी है,
बड़ा ज़रूरी यहाँ,
निर्णय पूर्व.
रोकना होगा,
इस विघटन को,
सूझ बूझ से.
Monday, September 5, 2022
जीवन मर्म
जीवन मर्म
=-=-=-=-=
सफ़र ही है,
मनुष्य का जीवन,
भिन्न सभी का.
होता यह है,
नाव के जैसा किन्तु,
दिखे समान.
सारी ही नावें,
एक जैसी तो दिखें,
पर होती नहीं हैं.
नाव व्यक्ति है,
संसार नदी समान,
शुरुआत में.
आस्था व विश्वास,
दो पतवार होते,
इस नाव के.
धैर्य व निष्ठा,
बाहुओं के समान,
उन्हें चलाते.
मन होता है,
चंचल हवाओं सा,
हो डगमग.
संस्कार होते,
हैं मार्गदर्शक ही,
कम्पास जैसे.
विवाह तक,
कागज़ की सी नावें,
मज़े से चलें.
किन्तु बाद में,
उसमें ज़्यादा जगह,
चाहिए होती.
जीवन साथी,
बने सहनाविक,
उसके बाद.
लक्ष्य भी तभी,
तय किए जाते हैं,
मिल जुल के.
और नदी भी,
हो जाती सागर सी,
लहरों सँग.
फिर उसमें,
बच्चे भी सवार होते,
कालांतर में.
हिचकोले तो,
नाव में आते रहते,
हर समय.
किन्तु गृहस्थी,
की कई उलझनें,
तूफ़ान लातीं.
कठिन होता,
उनसे निबटना,
किसी एक को.
दंपत्ति होते,
पूरक परस्पर,
न प्रति रूप.
आवश्यक हैं,
भिन्नताएं मतों की,
उनके बीच.
आगे के रास्ते,
में समन्वय ही तो,
प्रगति लाता.
निर्णय सारे,
धैर्यपूर्वक होवें,
सम्मति से ही.
भव सागर,
बिन साथी या गुरु,
पार न होवे.
सीखें ये मर्म,
शीघ्र ही सारे युवा,
कल्याण हेतु.❤️👏🥰
Friday, September 2, 2022
आज दाम्पत्य पर
आज दाम्पत्य पर,
विदेशों में तो,
पत्नी बच्चे न कुछ,
भी माने जाते.
किन्तु यहाँ पे,
मुखिया माने उन्हें,
संपत्ति जैसा.
वहाँ अति है,
उन्मुक्तता की यदि,
यहाँ मूकता.
निर्णय सारे,
वहाँ फ़ौरी ही होते,
यहाँ आदेश.
वहाँ यौन भी,
उन्मुक्त विवाह परे,
यहाँ कुंठित.
तलाक़ वहाँ,
बड़ी सामान्य बात,
यहाँ घुटन.
शादियाँ वहाँ,
होती टूटती रहें,
मन मर्ज़ी से.
यहाँ करते,
बुज़ुर्ग ही फ़ैसला,
बस स्वयं ही.
राय बच्चों की,
ली न माँगी जाती,
किसी घर में.
भावनाओं का,
वहाँ स्थान न कोई,
जीवन भर.
शादी निभाना,
यहाँ प्रतिबद्धता,
कठोर होती.
भावावेश ही,
यहाँ कारण बनें,
सभी दुखों के.
हिंसा तो बड़ी,
सर्व व्यापी हो चुकी,
वहाँ यहाँ भी.
अभाव बड़ा,
है दोनों ही तरफ़,
सौम्यता का तो.
शिक्षा न कोई,
दी जाती है कभी भी,
कहीं इस की.
वहाँ की नारी,
उन्मुक्त बराबरी,
ही चाहती है.
भरी यहाँ की,
शील संस्कारों सँग,
सबको भाती.
धैर्य उसका,
चट्टानों को लजाता,
अति श्रेष्ठ वो.
इसी कारण,
विदेशी भी चाहते,
शादी उससे.
किन्तु फिर भी,
मूल्य नहीं समझें,
पुरुष यहाँ.
बच्चे व घर,
नारी ही सम्हालती,
श्रेय लें नर.
भ्रम यही तो,
चलता यूँ रहता,
जीवन भर.
जिस दिन भी,
पुरुष ये समझें,
समृद्धि होगी.
ईश्वर करें,
वो दिन जल्द आए,
पूरे विश्व में.
Tuesday, August 30, 2022
नारी पर ही,
नारी पर ही,
आज लिख रहा हूँ,
कुछ हाइकु.
भोली बेचारी,
विश्वास है करती,
जाती है मारी.
ममता ही तो,
उसका गहना है,
व बेड़ियाँ भी.
घर को वह,
इतना महत्व देती,
भूलती सुध.
अपना ध्यान,
तो वो कभी कर ही,
न पाती स्वयं.
बाक़ी सदस्य,
इस समर्पण को,
मूल्य न देते.
मान लेते वे,
अधिकार अपना,
जन्म सिद्ध ही.
आदर उसे,
बहुधा ही न मिले,
जीवन भर.
यहीं पे ज़रा,
विचार ज़रूरी है,
सभी के लिए.
जानते तो हैं,
इस बात को सब,
बचपन से.
फिर भी कभी,
क्यों ध्यान न करते,
स्वयं इस पे?
कमी उसकी,
बेचैन भी करती,
सभी लोगों को.
सर्वस्व वह,
न्योछावर करती,
घर के लिए.
किन्तु बाद में,
एक माला ही आती,
फ़ोटो पे कभी.
समाज में ये,
प्रचलन क्या यों ही,
ठीक मान लें?
नारी को देवी,
क्या सिर्फ़ दिखावे को,
ही कहें सदा?
क्या नारी को ही,
पहल न करनी,
चाहिए स्वयं?
मानें न इसे,
स्वार्थ या भड़काना,
अनावश्यक.
घर में सभी,
विचार करें साँझा,
धैर्य शांति से.
लाभ इसका,
पीढ़ियों को मिलेगा,
बड़ा विशेष.
कम ही होंगे,
घरों में मतभेद,
या झगड़े भी.
प्रगति भी तो,
इसे ही कहते हैं,
सौम्यता सँग.
पुरुषों को भी,
इसके महत्व को,
मानना होगा.
तभी बनेंगे,
भारतीय फिर से,
विश्व प्रसिद्ध.
प्रार्थना ये है,
करबद्ध सभी से,
इसे फैलाएं. ❤️👏🥰
Monday, August 29, 2022
आँखें मूँद के
आँखें मूँद के,
खग सोच सकता,
बिल्ली नहीं है.
उचित न ये,
किसी मनुष्य हेतु,
कभी कहीं भी.
प्रतीत होने,
वाली समस्याएं भी,
उद्विग्न करें.
ज़िक्र उनका,
ज़रूरी हो जाता है,
परिवार में.
चर्चा उनपे,
खुले मन से शीघ्र,
होनी चाहिए.
अन्यथा वही,
विस्फोट का रूप भी,
ले सकती हैं.
ऐसी स्थिति तो,
किसी घर में कभी,
भी आ सके है.
समझदारी,
हमेशा सावधानी,
में ही होती है.
ध्यान इसका,
रखना ही चाहिए,
हर व्यक्ति को.
पुतला ही तो
पुतला ही तो,
ग़लतियों का होता,
हर इंसान.
उम्र के साथ,
ही तजुर्बा बढ़ता,
जाता है थोड़ा.
पर शायद,
ये कभी मुक़म्मल,
नहीं हो पाता.
इसीलिए तो,
राय ज़रूरी होती,
है दोस्तों की भी.
उससे कुछ,
तो मदद मिलती,
ही है शायद.
मसला जब,
अंदरूनी हो तब,
ख़ास तौर पे.
इसलिए ही,
इसे सहजता से,
लेना चाहिए.
मक़सद तो,
किसी दोस्त का कभी,
बुरा न होता.
हो सकता है,
फिर भी फ़ौरी तौर,
पे बुरा लगे.
गुज़ारिश ये,
बड़े अदब से है,
आज आपसे.
ग़लत कुछ,
न कीजिये गु्स्से में तो,
किसी के साथ.
किसी भी बात,
पे ज़िन्दगी भर का,
साथ न छोड़ें.
ध्यान ये रखें,
साथ पुराने लोग,
ही होंगे सदा.
फ़ौरी लोगों के,
असली मक़सद,
जल्द न दिखें.
मुमकिन है,
उनके इरादे भी,
नेक नहीं हों.
पैसा तो होता,
ही है इतना बुरा,
किसी के पास.
होए न कोई,
अपना मग़रूर,
इसके लिए.
इसका नशा,
उतरने के बाद,
दुःख ही देता.
देर न करें,
सम्हालने में ज़रा,
भी हालात को.
Wednesday, August 24, 2022
दिल दिमाग़ का फ़र्क़
फ़र्क़ समझें,
दिल व दिमाग़ का,
अच्छी तरह.
विज्ञान ने तो,
इनकी रचना ही,
समझाई है.
क्या कोई और,
भावनात्मक पक्ष,
भी हैं इनके?
भिन्न कुछ क्या,
उनके अपने ही,
नियंत्रण हैं?
बड़ा कौन है,
दिमाग़ दिल में,
ये समझना.
दिल करता,
संचालित सारे ही,
अंग हमेशा.
मन तक भी,
सुनता है पहले,
दिल की बात.
सफ़लता भी,
किसी काम में मिले,
मनोयोग से.
मनोयोग को,
ही और समझेंगे,
अब फिर से.
जिस काम में,
मन नहीं लगता,
वही टलता.
प्यार भी होता,
है बस दिल से ही,
न दिमाग़ से.
अच्छा या बुरा,
भी तय करता है,
दिल ही सदा.
यादों तक में,
दिल से उतर के,
कोई न रहे.
सफ़लता भी,
दिल लगा के किए,
कार्यों से मिले.
बदला लेना,
तो दिमाग़ चाहता,
न कभी दिल.
चैन न मिले,
बिना बदला लिए,
पल भर को.
ज़िद भी आती,
दिमाग़ में पहले,
किसी बात की.
आक्रोश भी तो,
दिमाग़ बिगाड़ता,
बुरी तरह.
रास्ते ग़लत,
भी दिमाग़ दिखाता,
हमें पहले.
मज़बूरी में,
साथ देना पड़ता,
है दिल को भी.
फिर भी दिल,
बेचैन रहता है,
आशंकाओं से.
ऐसे में हमें,
ध्यान देना चाहिए,
ज़्यादा सोच पे.
नुक्सान ज़्यादा,
ख़ुद को ही देता है,
क्रोध-बदला.
दिमाग़ की ही,
सदा सुनने वाला,
भटकता है.
इसी लिए तो,
सुननी ही चाहिए,
बात दिल की.
ईश्वर भी तो,
रहते दिल में ही,
हम सभी के.
Tuesday, August 23, 2022
भूलें तो होतीं
भूलें तो होतीं,
सभी में कमोबेश,
कुछ अलग.
दिखें बड़ी ही,
आसानी से औरों की,
अपनी नहीं.
देखें बुराई,
अपनी ही सदा व,
ख़ूबी औरों की.
पढ़ाया तो ये,
स्कूलों में भी गया है,
सदैव से ही.
भूल जाना भी,
है तो एक बुराई,
सभी के लिए.
तो फिर इसे,
एक जैसा ही देखें,
अपनों में भी.
अपने लिए,
कोई और अलग,
नियम न हो.
अपनी कमी,
दूर करने हेतु,
स्वयं मानें तो.
किन्तु औरों से,
उदारता बरतें,
धैर्य के साथ.
ध्यान ये रखें.
आदत बदलना,
मुश्किल होता.
इसी लिए तो,
कभी क्रोधित न हों,
कमियों पर.
घर में यही,
नियम पालन हो,
दंपत्ति द्वारा.
बच्चों के साथ,
ज़्यादा ही ध्यान रखें,
व्यवहार में.
वरना वे तो,
बिगड़ सकते हैं,
बहुत जल्दी.
गाँठ बाँध लें,
इसके पालन की,
यथा शीघ्र ही.
Monday, August 22, 2022
कारण क्या है
कारण क्या है,
सफ़ल न होने का,
आओ समझें।
शत्रु तो ये हैं,
व्यग्रता और चिंता,
एकाग्रता के।
उसके बिना,
खाना भी न खा सके,
ठीक से कोई।
हर क्षेत्र में,
ज़रूरी होती यही,
सर्व प्रथम।
करते तो हैं,
ख़र्चा व मेहनत,
सभी एक सी।
थोड़ा सा डर,
तो लगता सभी को,
परीक्षाओं से।
छोड़ न भागें,
अधूरा कोई कार्य,
ऐसे पलों में।
लगन से ही,
विश्वास बढ़ता है,
सफ़लता का।
थोड़ी सी और,
कोशिश से मिलती,
है सफ़लता।
नहीं असम्भव,
पाना किसी लक्ष्य को,
ठान लें यदि।
Thursday, August 18, 2022
संबंधों पर
संबंधों पर,
कुछ लिख गया है,
अचानक ये.
रिश्ते ख़ून के,
बड़े गहरे होते हैं,
सदा के लिए.
उनके बीच,
कटुता या आक्रोश,
अस्थाई होता.
शीघ्र ही सभी,
इसे भूल भी जाते,
सरलता से.
हो नहीं पाता,
ऐसा दंपत्तियों में,
देर तक भी.
भिन्नता बड़ी,
होती उनके बीच,
परिवारों की.
बोलचाल भी,
काफ़ी अलग होती,
हाव भाव में.
मिट न सके,
यह अंतर कभी,
पकी उम्र में.
इस स्थिति में,
व्यग्रता व क्रोध भी,
घातक होते.
कई बार तो,
ये बड़े झगडे भी,
बन जाते हैं.
ऐसे में बच्चे,
कुछ बोल न पाते,
बड़ों के बीच.
हो सकता है,
वह इसे स्वयं ही,
ठीक मान लें.
फिर वे करें,
वैसा ही व्यवहार,
विवाह बाद.
इसके लिए,
दोनों ही बराबर,
ज़िम्मेदार हैं.
एक दूजे को,
स्वीकारना चाहिए,
यथावत ही.
पुरुषों को ये,
समझ ही न आता,
अहंकार में.
इसी कारण,
व्यर्थ मतभेद भी,
जन्म लेते हैं.
उन्ही से कुंठा,
भी पैदा हो जाती है,
ज़्यादा स्त्रियों में.
उनकी चुप्पी,
कई रोगों तक को,
जन्म देती है.
इस तथ्य को,
समझना ही होगा,
देर सवेर.
जितना जल्दी,
जो इसे समझेगा,
उतना अच्छा.
कुछ और भी,
इस पर लिखना,
बेकार होगा.
Monday, August 8, 2022
शराबी-व्यथा
शराबी-व्यथा
कर्म या नशा,
किसे मैं अपनाऊँ,
बूझ न पाऊँ!
जानता हूँ मैं,
मिटे लाखों नवाब,
इसी द्वंद में।
जाने क्यों फिर,
भी समझा न पाऊँ,
मैं ख़ुद ही को।
ये भी समझूँ,
बड़ी अच्छी तरह,
बचपन से।
नशे से प्यार,
अच्छा बड़ा लगता,
स्थाई न होता।
न ले सके है,
स्थान परिवार का,
नशा कभी भी।
पैसे से नहीं,
ख़रीदा जाता प्यार,
कभी भी कहीं।
देर सवेर,
कमा सकते पैसे,
हम सभी ही।
बुरी आदतें,
या मतलबी दोस्त,
पैसों के यार।
परिवार से,
ही मिल सकता है,
सुख व प्यार।
नशा पैसे का,
भी शराब सा होता,
साथ न देता।
शराबी का तो,
साथ छोड़ देता है,
परिवार भी।
ग़रीबी में भी,
परिवार हमेशा,
साथ निभाता।
लील गई है,
मेरा वृहत ज्ञान,
यही भंवर।
स्वाभिमान भी,
मृतप्राण हो चुका,
न जाने कब।
हाल ये मेरा,
जग ज़ाहिर सा है,
त्रस्त बड़ा हूँ।
पूजा पाठ भी,
सब व्यर्थ हो चुके,
सारे ही मेरे।
खिल्ली उड़ाते,
अब लगते सारे,
मेरे ही दोस्त।
रिश्ते नाते भी,
अब मुझे न भाते,
खिन्न सा रहूँ।
और मैं अभी,
कितना नीचे गिरुँगा,
भयाक्रांत हूँ।
हे मे्रे इष्ट,
मार्ग आप दिखाएं,
शक्ति भी देवें।
गंभीरता से,
आत्मावलोकन मैं,
शीघ्र ही करुँ।
स्वयं के साथ,
परिवार को भी मैं,
सम्हाल सकूँ।
बुराई ही क्यों
बुराई ही क्यों,
ज़्यादा चर्चित होती,
पशुओं की भी?
समझना ये,
ज़रूरी होता है,
बचपन से।
भूल जाते हैं,
हम अच्छाइयों को,
सभी की जल्दी।
किन्तु एक भी,
बुराई याद रहे,
हमेशा हमें।
पशुओं का तो,
हाल और बुरा है,
मुहावरों में।
कुत्ते की पूँछ,
और गधे की अक़्ल,
को ही देख लें।
याद न आती,
उनकी वफ़ादारी,
या मेहनत।
हर पशु से,
सीख सकते हम,
अच्छा भी कुछ।
चीते की फुर्ती,
और शेर का धैर्य,
भी अद्भुत है।
वफ़ादारी में,
कुत्ते घोड़ों का ही तो,
बखान हुआ।
इसी तरह,
हर व्यक्ति में खोजें,
उसके गुण।
आलोचना से,
बुराइयाँ बढ़तीं,
इसे समझें।
किन्तु गुणों में,
वृद्धि होती है सदा,
प्रशंसा से ही।
फ़र्क़ समझें,
भूल अपराध का,
सभी में सदा।
भूलें क्षम्य हैं,
समझाएं धैर्य से,
अपराधों को।
कुत्ता पालना,
बहुत सिखा सके,
हर युवा को।
धैर्य प्रेम का,
वह अनुभव ही,
अमूल्य होता।
ऐसे दंपत्ति,
ही सृजित करेंगे,
सुखी घरों को।
क्रोध या घृणा,
अपमान तिरस्कार,
वहाँ न होंगे।
इसी प्रकार,
संस्कार परिष्कृत,
होते जाएंगे।
अन्यत्र यह,
शिक्षा मिलेगी नहीं ,
बच्चों को कभी।
हानि नहीं है,
जब भी सीख सके,
कोई इसको।
Thursday, August 4, 2022
कुत्ते की पूँछ
कुत्ते की पूँछ,
में क्या बुराई होती,
आओ समझें।
कटे बिना वो,
सीधी हो ही न सके,
जीवन भर।
नहीं दिखती,
अपनी कोई बुराई,
किसी को भी।
लगे अच्छी ही,
हमें वह हमेशा,
यही समस्या।
ज़िद क्रोध भी,
हमें नहीं छोड़ते,
ठीक वैसे ही।
नहीं सुनते,
हम बात किसी की,
अहंकार में।
टोंकने पर,
और ज़िद बढ़ती,
बुरी तरह।
समझाना भी,
ज़हर सा लगता,
अपनों का भी।
अंत में हम,
रह जाते अकेले,
दुःखी उदास।
जब भी इसे,
समझ लेंगे हम,
सुख बढेगा।
बुढ़ापे में तो,
इसे बदल पाना,
असंभव है।
अच्छा यही है,
इसे जल्दी समझें,
अपने आप।
बच्चे तो बस,
सीखेंगे हमसे ही,
अच्छा या बुरा।
निर्णय जो भी,
हमारे होंगे आज,
कल दिखेंगे।
पछतावे से,
मिलेगा कुछ नहीं,
हमें बाद में।
Sunday, July 24, 2022
दूर के ढोल
आज लिखे हैं 🥰
दूर के ढोल,
ही क्यों सुहाने लगें,
चलो समझें।
फूलों के भी तो,
कांटे यों ही दिखते,
पास आने से!
गुण दोष भी,
लोगों के हैं दिखते,
निकटता में।
किन्तु अक्सर,
तब दोष ही ज़्यादा,
स्पष्ट दिखते!
घृणा क्रोध भी,
प्रबल हो जाते हैं,
ऐसे समय।
मिट सी जातीं,
अच्छाइयाँ उनकी,
न जाने कैसे?
नहीं दिखता,
स्थाई समाधान भी,
सरल कोई।
अनायास ही,
निंदनीय शब्द भी,
कहे जाते हैं।
प्रेम ही होता,
उनका मूल सदा,
पीड़ा ज़्यादा दें।
हाल यही है,
सभी परिवारों का,
विश्व भर में!
जादू मन्त्र क्या,
कुछ कर पाएंगे,
चमत्कार सा!
प्रवचन भी,
कुछ प्रभावी होंगे,
क्या यहाँ पर?
मुश्किल होता,
रोकना संवेगों को,
न दुसाध्य भी!
स्वयं हमें ही,
हल खोजना होगा,
अंतर्मन में।
बस केवल,
आत्मावलोकन ही,
शक्ति स्त्रोत्र है।
बढ़ानी होगी,
संवाद प्रवीणता,
हमें सदा ही।
कर के देखें,
लगन नियम से,
कुछ दिन तो!
यदि ज़रा भी,
प्रसन्नता मिले तो,
दुजों से बाँटें।
Tuesday, July 12, 2022
आज पिता के बारे में
पिता महिमा
अति अल्प वर्णित
श्रेष्ठ अत्यंत
उसकी निष्ठां
निज संतति हेतु
अतुल्य सदा
चुप रहे वो
सामान्य बातों पर
नहीं अन्यथा
माँ से उच्च
है धैर्यवान पिता
बच्चे न मानें
ढाल है वही
पूरे कुटुंब की भी
जीवन भर
क्रोध उसका
विकट होता शीघ्र
पर क्षणिक
हिंसक भी वो
हो ही जाता है तभी
किन्तु मोह में
प्रेम न कभी
उसका घटता है
अपितु बढे
सीखता रहे
नित प्यार की कला
अर्धांगिनी से
उम्र के साथ
वह निखरता है
कंचन सम
प्रौढ़ होने पे
लगता वो क्षीण है
स्नेह न घटे
राय उसकी
असह्य तो लगती
बिन माँगे पे
जान ही लेते
इस मर्म को सभी
बड़े होकर
काश ये ज्ञान
मिल सके शिशु को
शैशव में ही
शिक्षा यह भी
प्रारम्भ होनी चाहिए
हर स्कूल में
तभी तो होगा
सर्वांगीण विकास
पूरे विश्व का
इसके लिए
केवल सनातन
ही सक्षम है
Saturday, May 28, 2022
लिपि का महत्त्व
भारत एक बहुत बड़ा देश है और सैकड़ों साल से हम सुनते चले आ रहे हैं की बोली अलग-अलग जगहों पर बदलती रहती है।
1835 में लॉर्ड मैकाले ने अपने देश की इसी विविधता को एक कमी की तरह से दिखाकर इंग्लिश लैंग्वेज में पढ़ाई को अनिवार्य व आकर्षक कर दिया।
इस छोटी सी दिखने वाली योजना से मैकाले ने किस तरह से हमारी मानसिकता को गुलाम बना दिया और हमारे पीढ़ियों को अपनी संस्कृति से दूर कर दिया। और हम अपनी विरासत को भी भूलकर, काफ़ी हद तक उसे दकियानुसी, अंधविश्वास व फिज़ूल समझने लगे।
इसके विपरीत विश्व के अधिकांश देशों में अलग- भाषाओं के लिए केवल एक ही लिपि का प्रयोग किया जाता है। अधिकांश भाषाओं के लिए तो इंग्लिश की रोमन लिपि ही प्रयोग हो रही है।
यद्यपि इस लिपि में बहुत सारी कमियाँ हैँ, लेकिन कोई और विकल्प न होने के कारण ये मज़बूरी में चलती जा रही है।
इसके विपरीत देवनागरी लिपि अपनी ध्वनि सम्मत विशेषताओ के आधार पर, पूरे विश्व की प्रत्येक भाषा को यथावत लिखने व पढ़ने में सर्वोत्तम है।
आज भी हमारे राजनीतिज्ञ अपने क्षेत्रीय फायदों को सर्वोपरि मानते हैँ। वे अपनी भाषा के साथ ही लिपि को भी यथावत बनाए रखने की होड़ में लगे हुए हैँ।
इस विषय पर एक बड़ा लम्बा शोधपारक लेख इंटरनेट पर पढ़ने को मिला है। उसका लिंक नीचे दे रहा हूँ।
https://scroll.in/magazine/821605/thomas-macaulay-and-the-debate-over-english-education-in-india
समस्त राष्ट्रवादी सोच रखने वाले नागरिकों से सविनय अनुरोध है कि वे इसे पूरा पढ़कर विचार करें कि कैसे हमारी भावी पीढ़ियों को apni-2 भाषाओं को एक ही लिपि में पढ़ने लिखने के लिए तैयार कर सकते हैँ।
इस ब्लॉग के विषय को अधिक से अधिक माध्यमों से शेयर व प्रसारित भी करते रहें।