Sunday, October 2, 2022

क्या हम अचानक आस्तिक हो गए?

क्या हम अचानक आस्तिक हो गए?

*जब बिहारी जी ने हमें ऊँची छत से पत्थर के फ़र्श पर गिरते समय गोद में लेकर बचाया।*

संयोग या चमत्कार, पाठक स्वयं तय करें।🙏

अपना ये आश्चर्यचकित करने वाला अनुभव शेयर करने का आज मन हुआ है। 👇🏻

(बात 1976 की है, व पृष्ठ भूमि को स्पष्ट करने हेतु थोड़ी लम्बी हो गई है।)

अपने पापा के *घोर नास्तिक/ अनीश्वरवादी व्यक्तित्व, व अचेतन अवस्था में भी, जीवन पर्यन्त, *राम - राम का जवाब रावण - रावण से ही देते रहने वाले*, एवं विशुद्ध आर्य समाज रीतियों को ही मानने के कारण, बचपन में मेरा भी किसी  मंदिर/पूजा आदि में सिर्फ़ प्रसाद/मिठाई के लालच में ही जाना होता था।

या फिर जन्माष्टमी/रामलीला वगैरह जैसे अवसरों पर सजावट, के साथ आयोजित होने वाले कवि सम्मलेन, मुशायरे आदि में भी सारे लोग साथ जाया करते थे।

यानि, अपने पापा की ही तरह हम भी घोर नास्तिक हो गए थे।

हमारी जो कुछ भी आस्था, विशेषकर *बिहारी जी के प्रति,* उपजी है, वो हमारी पत्नी के उन पर अटूट विश्वास के ही कारण ही है।

पापा ने तो मम्मी व दादी तक को घर में किसी भी तरह की सनातन या ब्राह्मणों को बुलाकर करने वाली पूजाओं के लिए दृढ़ता से मना कर रखा था। और वे दोनों पापा के कचहरी जाने के बाद ही, *छुपाकर होली, दिवाली या नवरात्री पर नाम मात्र की ही पूजा किया करतीं थीं।*

इसके विपरीत, हमने अपनी पत्नी को उनकी इच्छा-श्रद्धा के हिसाब से, सारी पूजा अर्चना की पूर्ण स्वतंत्रता के साथ ही प्रोत्साहित भी किया था।

कीर्ति ने शादी के बाद ही सबसे पहले हमें अपनी बिहारी जी पर अत्यधिक आस्था, निष्ठा के बारे में बताया था, *कि उनके पापा उन्हें साल में एक बार ज़रूर बिहारी जी के दर्शन कराने के लिए कार से लेकर जाते रहे हैं।*

तब हमने उनसे कहा था कि हम वैसा तो शायद नहीं कर पाएंगे, पर जब भी कहीं आते-जाते पर हमारी ट्रेन मथुरा होकर जाया करेगी, *तो हमेशा जर्नी ब्रेक करके, बिहारी जी के दर्शन ज़रूर कराएंगे।*

यह भी तय हुआ था, कि हम उनके साथ उनकी इच्छानुसार किसी भी मंदिर/पूजा आदि में अवश्य जाएंगे,  लेकिन बिना अपनी इच्छा के कहीं प्रणाम आदि नहीं करेंगे।

ऐसे ही किसी अवसर पर, एक बार उन्होंने कहा कि इस बार वृन्दावन नहीं जाएंगे, व सीधी बदायूँ जाने वाली उसी वक़्त मिल रही ट्रेन से चलते हैं।

लेकिन, हमने ही उन्हें समझाया कि *अपना नियम बिना किसी वैध कारण के नहीं तोडना चाहिए।* और हम लोग दोनों छोटे बच्चों के साथ दर्शन करने गए।

हमेशा की तरह ही, हम लोग मंदिर में ऊपर साइड वाले बरामदे में खड़े हुए थे, *जहाँ उनके पुराने वरिष्ठ पुजारी जी हम लोगों को लेकर जाते थे।*

उस दिन आरती शुरू होने पर, अचानक हमारे मन में ये विचार आया कि *जिस मूर्ति के सामने सिर झुकाने को, इतनी भारी भीड़ हमेशा पागलों की तरह धक्का मुक्की करती रहती है, उसके सामने थोड़ा सा सिर झुकाने में क्या तुम कुछ बहुत छोटे हो जाओगे?*

और, तब हमने बड़ी चोरी से, जीवन में पहली बार, *पल भर को पलक झपका कर मन से मानो उन्हें प्रणाम किया था।*

फिर, घर पहुँच कर अगली सुबह को हमारी आँख मम्मी की तेज़ आवाज़ से खुली। वे कह रहीं थीं, *"जल्दी से उठकर छत पर के बंदरों को भगाओ, वह सारे पापड़ खा और बर्बाद कर रहे हैं।"*

हम फ़ौरन लुंगी में ही एक छोटा सा डंडा लेकर छत पर दौड़ते हुए गए। और बंदरों को भगाने के लिए काफ़ी तेज़ी से उनके पीछे दौड़ रहे थे।

भागते-2 हम किनारे तक पहुँच गए और वहाँ से आगे जो एक 6x6 फ़िट की खुली जगह थी, उसकी छोटी सी दीवार से पहले रुक नहीं पाए।

सारे बन्दर तो उस खुली जगह से छलांग लगाकर भाग गए, लेकिन हम उस मुंडेर से टकरा कर, उलटे होकर कमर के बल, कोई 10 फ़िट नीचे पथ्थर के फ़र्श पर गिर पड़े।

लेकिन हमें न तो कोई चोट लगी, और कहीं दर्द भी नहीं हुआ।

मम्मी की घबराहट में लोगों को आवाज़ सुनकर पापा व उनके कई मुवक्किल बाहर के ऑफिस से फ़ौरन आकर हमें उठाने को आगे बढ़े।

पर हमने लेते हुए ही कहा हम बिल्कुल ठीक हैं, और अपने आप ही उठेंगे।

पापा के पूँछने पर अचानक हमारे मुँह से निकला, *"हमें तो बस ये लगा कि बिहारी जी ने ही हमें गोद में लेकर आराम से लिटा दिया था।*

इस पर पापा ने हमें झिड़कते हुए कहा, *"हिष्ट, पागल हो गए हो क्या?"* और, हमने भी बड़े शांत मन से, फ़ौरन ही जवाब दिया, *"हम आपसे बिहारी जी को भगवान वगेरा मानने को बिल्कुल नहीं कह रहे हैं, लेकिन हमें जो लगा बस वही बता रहे हैं।"*

उसके बाद जब हमने पिछली दोपहर वाली चोरी से ज़रा सी देर को पलक झपका कर बिहारी जी को मन में ही प्रणाम करने के लिए आई भावना के बारे में मम्मी, दादी और कीर्ती को बताया, तब कीर्ती ने कहा था, *"आपको तो पहली ही बार में बिहारी जी के साक्षात दर्शन हो गए, और हमें आजतक भी नहीं हो पाए!"*

उसके बाद से ही, हमने कीर्ती द्वारा घर के छोटे से कोने में अनेक देवी - देवताओं की फ़ोटो व मूर्तियों की पूजा में, *श्रद्धा से सिर्फ़ बिहारी जी की फ़ोटो पर ध्यान केंद्रित करके हाथ जोड़ना शुरू कर दिया था।*

यद्यपि, हमने स्वयं कभी भी किसी तरह की पूजा ध्यान आदि नहीं किया है, पर सोते - जागते, जब भी किसी के लिए कुछ अच्छा होने की इच्छा उत्पन्न होती है, *तब मन में उनकी उसी मूर्ति की याद अपने आप आ जाती है।*

पता नहीं, *क्या हम अब आस्तिक हो गए हैं!*

उहापोह क्या?

ऊहा पोह क्या?
आइए ये समझें,
स्वयं ही हम.

हम सभी में,
कुछ अच्छे व बुरे,
गुण होते हैं.

अच्छे दिखते,
बड़ी आसानी से ही,
किन्तु न बुरे.

उन्हें तो कोई,
अपना ही बताता,
है प्रेम वश.

किन्तु क्रोध में,
वो बड़ा बुरा लगे,
आम तौर से.

अक्सर हम,
उस अपने को ही,
ग़लत मानें.

फिर बाद में,
कभी ख़याल आता,
क्या वो सही था.

उस स्थिति में,
मन की हलचल,
ही ऊहा पोह.

ऐसे वक़्त में,
गुरु ढूंढना चाहिए,
स्वयं से श्रेष्ठ.

स्वयं से श्रेष्ठ,
किसी को भी मानना,
मुश्किल बड़ा.

निष्पक्ष होना,
अत्यंत कठिन होता,
किसी के लिए.

साधना बड़ी,
करना ही चाहिए,
इस दिशा में.

तभी संभव,
हो सकेगी प्रगति,
वास्तविक ही.

Thursday, September 15, 2022

सामंजस्य

सामंजस्य

स्वयं को जानें,
हम पहले पूरा,
तभी दूजों को.

अपने दोष,
जब समझ लेंगे,
प्रसन्न होंगे.

दोष तो होते,
भिन्न सभी में सदा,
दिखें दूजों के.

इच्छा दूजे को,
बदलने की देती,
जन्म दुखों को.

प्रेम राग में,
अधिपत्य नहीं हो,
बदलने का.

स्वीकार करें,
सभी को यथावत,
परिवार में.

तभी बढ़ेगा,
परस्पर प्रेम मान,
सब के बीच.

अन्यथा होगी,
संवाद शून्यता ही,
प्रखर वहाँ.

सुनने वाला,
मान रहा है यही,
महत्वपूर्ण.

सुनें ज़्यादा व,
बोलें कम ही तोल,
यही सिद्धांत.

मतभेदों को,
निजता प्रेम से ही,
सुलझा सकें.

न हो उनमें,
क्रोध व अपमान,
कभी किसी का.

राय दूजे की,
भी सही हो सकती,
ये सोचा करें.

Sunday, September 11, 2022

ख़ुशनुमाँ ही

*ख़ुशनुमाँ ही*

महफ़िल थी,
वो बड़ी ख़ुशनुमाँ,
सब बुड्ढे थे.

मैं पापा दादी,
मम्मी बहन सँग,
हँस रहे थे.

बुआ थीं ख़ास,
बस एक ही प्यारी,
बाक़ी फ़र्क़ थीं.

उनका प्यार,
प्यार ही था अलग,
सबसे जुदा.

बाक़ी सभी की,
कई अलग बातें,
चुभती सी थीं.

भाभी भी एक,
थीं सबसे अलग,
माँ की ही जैसी.

बात साली की,
कैसे कोई भूलेगा,
खिलती कली.

छोटा भाई तो,
बेटे जैसा ही लगा,
बड़ा हो के भी.

बेटा तो मुझे,
बिल्कुल अपना ही,
साया सा लगा.

पत्नी के बाद,
बेटी बहू दोनों ने,
कमी न छोड़ी.

यादो में थी वो,
सभी की वैसी सच्ची,
मुस्कान लिए.

शायद उसे,
मोक्ष ही मिल गया,
तभी नहीं थी.

मस्त थे सभी,
दामाद जीजा तक,
बेफ़िक्र होके.

बातें सबको,
एक दूजे की सभी,
भा भी रहीं थीं.

होली के जैसे,
एक रंग में रंगे,
हुए थे सब.

Friday, September 9, 2022

पीढ़ी अन्तर?

 देखा ख़्वाब क्या,

कल रात अजीब,

हक़ीक़त सा.


सभी के बीच,

पिता के बाल सखा,

सँग मैं भी था.


मान व डर,

में क्या होता प्रमुख,

पिता पुत्र में?


यही था चर्चा,

का मौलिक विषय,

तीनों के बीच.


उन्होंने कहा,

मान, किन्तु डर था,

मेरा कहना.


कुछ देर में,

वे भी समझ गए,

मेरी बातों को.


उन्होंने कहा,

उन्हें ऐसा व्यवहार 

मिला जन्म से.


और वो बनी,

उनकी भी आदत,

बड़े होकर.


तभी ये सोचा,

क्या मैं कुछ सुधरा,

जीवन भर!


पीढ़ियों से ही,

ये आदत बढ़ती,

चली जा रही.


बच्चे भी ढीठ,

बड़े होते जा रहे,

उत्तरोत्तर.


सुनते तो हैं,

वो सारी बातें किन्तु,

करें मन की!


परिवारों में,

बढ़ती जा रही है,

अदृश्य दूरी.


मनन भी है,

बड़ा ज़रूरी यहाँ,

निर्णय पूर्व.


रोकना होगा,

इस विघटन को,

सूझ बूझ से.

Monday, September 5, 2022

जीवन मर्म

 जीवन मर्म

=-=-=-=-=

सफ़र ही है,

मनुष्य का जीवन,

भिन्न सभी का.


होता यह है,

नाव के जैसा किन्तु,

दिखे समान.


सारी ही नावें,

एक जैसी तो दिखें,

पर होती नहीं हैं.


नाव व्यक्ति है,

संसार नदी समान,

शुरुआत में.


आस्था व विश्वास,

दो पतवार होते,

इस नाव के.


धैर्य व निष्ठा,

बाहुओं के समान,

उन्हें चलाते.


मन होता है,

चंचल हवाओं सा,

हो डगमग.


संस्कार होते,

हैं मार्गदर्शक ही,

कम्पास जैसे.


विवाह तक,

कागज़ की सी नावें,

मज़े से चलें.


किन्तु बाद में,

उसमें ज़्यादा जगह,

चाहिए होती.


जीवन साथी,

बने सहनाविक,

उसके बाद.


लक्ष्य भी तभी,

तय किए जाते हैं,

मिल जुल के.


और नदी भी,

हो जाती सागर सी,

लहरों सँग.


फिर उसमें,

बच्चे भी सवार होते,

कालांतर में.


हिचकोले तो,

नाव में आते रहते,

हर समय.


किन्तु गृहस्थी,

की कई उलझनें,

तूफ़ान लातीं.


कठिन होता,

उनसे निबटना,

किसी एक को.


दंपत्ति होते,

पूरक परस्पर,

न प्रति रूप.


आवश्यक हैं,

भिन्नताएं मतों की,

उनके बीच.


आगे के रास्ते,

में समन्वय ही तो,

प्रगति लाता.


निर्णय सारे,

धैर्यपूर्वक होवें,

सम्मति से ही.


भव सागर,

बिन साथी या गुरु,

पार न होवे.


सीखें ये मर्म,

शीघ्र ही सारे युवा,

कल्याण हेतु.❤️👏🥰

Friday, September 2, 2022

आज दाम्पत्य पर

 आज दाम्पत्य पर,


विदेशों में तो,

पत्नी बच्चे न कुछ,

भी माने जाते.


किन्तु यहाँ पे,

मुखिया माने उन्हें,

संपत्ति जैसा.


वहाँ अति है,

उन्मुक्तता की यदि,

यहाँ मूकता.


निर्णय सारे,

वहाँ फ़ौरी ही होते,

यहाँ आदेश.


वहाँ यौन भी,

उन्मुक्त विवाह परे,

यहाँ कुंठित.


तलाक़ वहाँ,

बड़ी सामान्य बात,

यहाँ घुटन.


शादियाँ वहाँ,

होती टूटती रहें,

मन मर्ज़ी से.


यहाँ करते,

बुज़ुर्ग ही फ़ैसला,

बस स्वयं ही.


राय बच्चों की,

ली न माँगी जाती,

किसी घर में.


भावनाओं का,

वहाँ स्थान न कोई,

जीवन भर.


शादी निभाना,

यहाँ प्रतिबद्धता,

कठोर होती.


भावावेश ही,

यहाँ कारण बनें,

सभी दुखों के.


हिंसा तो बड़ी,

सर्व व्यापी हो चुकी,

वहाँ यहाँ भी.


अभाव बड़ा,

है दोनों ही तरफ़,

सौम्यता का तो.


शिक्षा न कोई,

दी जाती है कभी भी, 

कहीं इस की.


वहाँ की नारी,

उन्मुक्त बराबरी,

ही चाहती है.


भरी यहाँ की,

शील संस्कारों सँग,

सबको भाती.


धैर्य उसका,

चट्टानों को लजाता,

अति श्रेष्ठ वो.


इसी कारण,

विदेशी भी चाहते,

शादी उससे.


किन्तु फिर भी,

मूल्य नहीं समझें,

पुरुष यहाँ.


बच्चे व घर,

नारी ही सम्हालती,

श्रेय लें नर.


भ्रम यही तो,

चलता यूँ रहता,

जीवन भर.


जिस दिन भी,

पुरुष ये समझें,

समृद्धि होगी.


ईश्वर करें,

वो दिन जल्द आए,

पूरे विश्व में.

Tuesday, August 30, 2022

नारी पर ही,

नारी पर ही,

आज लिख रहा हूँ,

कुछ हाइकु.


भोली बेचारी,

विश्वास है करती,

जाती है मारी.


ममता ही तो,

उसका गहना है,

व बेड़ियाँ भी.


घर को वह,

इतना महत्व देती,

भूलती सुध.


अपना ध्यान,

तो वो कभी कर ही,

न पाती स्वयं.


बाक़ी सदस्य,

इस समर्पण को,

मूल्य न देते.


मान लेते वे,

अधिकार अपना,

जन्म सिद्ध ही.


आदर उसे,

बहुधा ही न मिले,

जीवन भर.


यहीं पे ज़रा,

विचार ज़रूरी है,

सभी के लिए.


जानते तो हैं,

इस बात को सब,

बचपन से.


फिर भी कभी,

क्यों ध्यान न करते,

स्वयं इस पे?


कमी उसकी,

बेचैन भी करती,

सभी लोगों को.


सर्वस्व वह,

न्योछावर करती,

घर के लिए.


किन्तु बाद में,

एक माला ही आती,

फ़ोटो पे कभी.


समाज में ये,

प्रचलन क्या यों ही,

ठीक मान लें?


नारी को देवी,

क्या सिर्फ़ दिखावे को,

ही कहें सदा?


क्या नारी को ही,

पहल न करनी,

चाहिए स्वयं?


मानें न इसे,

स्वार्थ या भड़काना,

अनावश्यक.


घर में सभी,

विचार करें साँझा,

धैर्य शांति से.


लाभ इसका,

पीढ़ियों को मिलेगा,

बड़ा विशेष.


कम ही होंगे,

घरों में मतभेद,

या झगड़े भी.


प्रगति भी तो,

इसे ही कहते हैं,

सौम्यता सँग.


पुरुषों को भी,

इसके महत्व को,

मानना होगा.


तभी बनेंगे,

भारतीय फिर से,

विश्व प्रसिद्ध.


प्रार्थना ये है,

करबद्ध सभी से,

इसे फैलाएं. ❤️👏🥰


Monday, August 29, 2022

आँखें मूँद के

 आँखें मूँद के,

खग सोच सकता,

बिल्ली नहीं है.


उचित न ये,

किसी मनुष्य हेतु,

कभी कहीं भी.


प्रतीत होने,

वाली समस्याएं भी,

उद्विग्न करें.


ज़िक्र उनका,

ज़रूरी हो जाता है,

परिवार में.


चर्चा उनपे,

खुले मन से शीघ्र,

होनी चाहिए.


अन्यथा वही,

विस्फोट का रूप भी,

ले सकती हैं.


ऐसी स्थिति तो,

किसी घर में कभी,

भी आ सके है.


समझदारी,

हमेशा सावधानी,

में ही होती है.


ध्यान इसका,

रखना ही चाहिए,

हर व्यक्ति को.

पुतला ही तो

 पुतला ही तो,

ग़लतियों का होता,

हर इंसान.


उम्र के साथ,

ही तजुर्बा बढ़ता,

जाता है थोड़ा.


पर शायद,

ये कभी मुक़म्मल,

नहीं हो पाता.


इसीलिए तो,

राय ज़रूरी होती,

है दोस्तों की भी.


उससे कुछ,

तो मदद मिलती,

ही है शायद.


मसला जब,

अंदरूनी हो तब,

ख़ास तौर पे.


इसलिए ही,

इसे सहजता से,

लेना चाहिए.


मक़सद तो,

किसी दोस्त का कभी,

बुरा न होता.


हो सकता है,

फिर भी फ़ौरी तौर,

पे बुरा लगे.


गुज़ारिश ये,

बड़े अदब से है,

आज आपसे.


ग़लत कुछ,

न कीजिये गु्स्से में तो,

किसी के साथ.


किसी भी बात,

पे ज़िन्दगी भर का,

साथ न छोड़ें.


ध्यान ये रखें,

साथ पुराने लोग,

ही होंगे सदा.


फ़ौरी लोगों के,

असली मक़सद,

जल्द न दिखें.


मुमकिन है,

उनके इरादे भी,

नेक नहीं हों.


पैसा तो होता,

ही है इतना बुरा,

किसी के पास.


होए न कोई,

अपना मग़रूर,

इसके लिए.


इसका नशा,

उतरने के बाद,

दुःख ही देता.


देर न करें,

सम्हालने में ज़रा,

भी हालात को.


Wednesday, August 24, 2022

दिल दिमाग़ का फ़र्क़

 फ़र्क़ समझें,

दिल व दिमाग़ का,

अच्छी तरह.


विज्ञान ने तो,

इनकी रचना ही,

समझाई है.


क्या कोई और,

भावनात्मक पक्ष,

भी हैं इनके?


भिन्न कुछ क्या,

उनके अपने ही,

नियंत्रण हैं?


बड़ा कौन है,

दिमाग़ दिल में,

ये समझना.


दिल करता,

संचालित सारे ही,

अंग हमेशा.


मन तक भी,

सुनता है पहले,

दिल की बात.


सफ़लता भी,

किसी काम में मिले,

मनोयोग से.


मनोयोग को,

ही और समझेंगे,

अब फिर से.


जिस काम में,

मन नहीं लगता,

वही टलता.


प्यार भी होता,

है बस दिल से ही,

न दिमाग़ से.


अच्छा या बुरा,

भी तय करता है,

दिल ही सदा.


यादों तक में,

दिल से उतर के,

कोई न रहे.


सफ़लता भी,

दिल लगा के किए,

कार्यों से मिले.


बदला लेना,

तो दिमाग़ चाहता,

न कभी दिल.


चैन न मिले,

बिना बदला लिए,

पल भर को.


ज़िद भी आती,

दिमाग़ में पहले,

किसी बात की.


आक्रोश भी तो,

दिमाग़ बिगाड़ता,

बुरी तरह.


रास्ते ग़लत,

भी दिमाग़ दिखाता,

हमें पहले.


मज़बूरी में,

साथ देना पड़ता,

है दिल को भी.


फिर भी दिल,

बेचैन रहता है,

आशंकाओं से.


ऐसे में हमें,

ध्यान देना चाहिए,

ज़्यादा सोच पे.


नुक्सान ज़्यादा,

ख़ुद को ही देता है,

क्रोध-बदला.


दिमाग़ की ही,

सदा सुनने वाला,

भटकता है.


इसी लिए तो,

सुननी ही चाहिए,

बात दिल की.


ईश्वर भी तो,

रहते दिल में ही,

हम सभी के.

Tuesday, August 23, 2022

भूलें तो होतीं

 भूलें तो होतीं,

सभी में कमोबेश,

कुछ अलग.


दिखें बड़ी ही,

आसानी से औरों की,

अपनी नहीं.


देखें बुराई,

अपनी ही सदा व,

ख़ूबी औरों की.


पढ़ाया तो ये,

स्कूलों में भी गया है,

सदैव से ही.


भूल जाना भी,

है तो एक बुराई,

सभी के लिए.


तो फिर इसे,

एक जैसा ही देखें,

अपनों में भी.


अपने लिए,

कोई और अलग,

नियम न हो.


अपनी कमी,

दूर करने हेतु,

स्वयं मानें तो.


किन्तु औरों से,

उदारता बरतें,

धैर्य के साथ.


ध्यान ये रखें.

आदत बदलना,

मुश्किल होता.


इसी लिए तो,

कभी क्रोधित न हों,

कमियों पर.


घर में यही,

नियम पालन हो,

दंपत्ति द्वारा.


बच्चों के साथ,

ज़्यादा ही ध्यान रखें,

व्यवहार में.


वरना वे तो,

बिगड़ सकते हैं,

बहुत जल्दी.


गाँठ बाँध लें,

इसके पालन की,

यथा शीघ्र ही.

Monday, August 22, 2022

कारण क्या है

 कारण क्या है,

सफ़ल न होने का,

आओ समझें।


शत्रु तो ये हैं,

व्यग्रता और चिंता,

एकाग्रता के।


उसके बिना,

खाना भी न खा सके,

ठीक से कोई।


हर क्षेत्र में,

ज़रूरी होती यही,

सर्व प्रथम।


करते तो हैं,

ख़र्चा व मेहनत,

सभी एक सी।


थोड़ा सा डर,

तो लगता सभी को,

परीक्षाओं से।


छोड़ न भागें,

अधूरा कोई कार्य,

ऐसे पलों में।


लगन से ही,

विश्वास बढ़ता है,

सफ़लता का।


थोड़ी सी और,

कोशिश से मिलती,

है सफ़लता।


नहीं असम्भव,

पाना किसी लक्ष्य को,

ठान लें यदि।

Thursday, August 18, 2022

संबंधों पर

 संबंधों पर,

कुछ लिख गया है,

अचानक ये.


रिश्ते ख़ून के,

बड़े गहरे होते हैं,

सदा के लिए.


उनके बीच,

कटुता या आक्रोश,

अस्थाई होता.


शीघ्र ही सभी,

इसे भूल भी जाते,

सरलता से.


हो नहीं पाता,

ऐसा दंपत्तियों में,

देर तक भी.


भिन्नता बड़ी,

होती उनके बीच,

परिवारों की.


बोलचाल भी,

काफ़ी अलग होती,

हाव भाव में.


मिट न सके,

यह अंतर कभी,

पकी उम्र में.


इस स्थिति में,

व्यग्रता व क्रोध भी,

घातक होते.


कई बार तो,

ये बड़े झगडे भी,

बन जाते हैं.


ऐसे में बच्चे,

कुछ बोल न पाते,

बड़ों के बीच.


हो सकता है,

वह इसे स्वयं ही,

ठीक मान लें.


फिर वे करें,

वैसा ही व्यवहार,

विवाह बाद.


इसके लिए,

दोनों ही बराबर,

ज़िम्मेदार हैं.


एक दूजे को,

स्वीकारना चाहिए,

यथावत ही.


पुरुषों को ये,

समझ ही न आता,

अहंकार में.


इसी कारण,

व्यर्थ मतभेद भी,

जन्म लेते हैं.


उन्ही से कुंठा,

भी पैदा हो जाती है,

ज़्यादा स्त्रियों में.


उनकी चुप्पी,

कई रोगों तक को,

जन्म देती है.


इस तथ्य को,

समझना ही होगा,

देर सवेर.


जितना जल्दी,

जो इसे समझेगा,

उतना अच्छा.


कुछ और भी,

इस पर लिखना,

बेकार होगा.

Monday, August 8, 2022

शराबी-व्यथा

 शराबी-व्यथा


कर्म या नशा,

किसे मैं अपनाऊँ,

बूझ न पाऊँ!


जानता हूँ मैं,

मिटे लाखों नवाब,

इसी द्वंद में।


जाने क्यों फिर,

भी समझा न पाऊँ,

मैं ख़ुद ही को।


ये भी समझूँ,

बड़ी अच्छी तरह,

बचपन से।


नशे से प्यार,

अच्छा बड़ा लगता,

स्थाई न होता।


न ले सके है,

स्थान परिवार का,

नशा कभी भी।


पैसे से नहीं,

ख़रीदा जाता प्यार,

कभी भी कहीं।


देर सवेर,

कमा सकते पैसे,

हम सभी ही।


बुरी आदतें,

या मतलबी दोस्त,

पैसों के यार।


परिवार से,

ही मिल सकता है,

सुख व प्यार।


नशा पैसे का,

भी शराब सा होता,

साथ न देता।


शराबी का तो,

साथ छोड़ देता है,

परिवार भी।


ग़रीबी में भी,

परिवार हमेशा,

साथ निभाता।


लील गई है,

मेरा वृहत ज्ञान,

यही भंवर।


स्वाभिमान भी,

मृतप्राण हो चुका,

न जाने कब।


हाल ये मेरा,

जग ज़ाहिर सा है,

त्रस्त बड़ा हूँ।


पूजा पाठ भी,

सब व्यर्थ हो चुके,

सारे ही मेरे।


खिल्ली उड़ाते,

अब लगते सारे,

मेरे ही दोस्त।


रिश्ते नाते भी,

अब मुझे न भाते,

खिन्न सा रहूँ।


और मैं अभी,

कितना नीचे गिरुँगा,

भयाक्रांत हूँ।


हे मे्रे इष्ट,

मार्ग आप दिखाएं,

शक्ति भी देवें।


गंभीरता से,

आत्मावलोकन मैं,

शीघ्र ही करुँ।


स्वयं के साथ,

परिवार को भी मैं,

सम्हाल सकूँ।

बुराई ही क्यों

 बुराई ही क्यों,

ज़्यादा चर्चित होती,

पशुओं की भी?


समझना ये,

ज़रूरी होता है,

बचपन से।


भूल जाते हैं,

हम अच्छाइयों को,

सभी की जल्दी।


किन्तु एक भी,

बुराई याद रहे,

हमेशा हमें।


पशुओं का तो,

हाल और बुरा है,

मुहावरों में।


कुत्ते की पूँछ,

और गधे की अक़्ल,

को ही देख लें।


याद न आती,

उनकी वफ़ादारी,

या मेहनत।


हर पशु से,

सीख सकते हम,

अच्छा भी कुछ।


चीते की फुर्ती,

और शेर का धैर्य,

भी अद्भुत है।


वफ़ादारी में,

कुत्ते घोड़ों का ही तो,

बखान हुआ।


इसी तरह,

हर व्यक्ति में खोजें,

उसके गुण।


आलोचना से,

बुराइयाँ बढ़तीं,

इसे समझें।


किन्तु गुणों में,

वृद्धि होती है सदा,

प्रशंसा से ही।


फ़र्क़ समझें,

भूल अपराध का,

सभी में सदा।


भूलें क्षम्य हैं,

समझाएं धैर्य से,

अपराधों को।


कुत्ता पालना,

बहुत सिखा सके,

हर युवा को।


धैर्य प्रेम का,

वह अनुभव ही,

अमूल्य होता।


ऐसे दंपत्ति,

ही सृजित करेंगे,

सुखी घरों को।


क्रोध या घृणा,

अपमान तिरस्कार,

वहाँ न होंगे।


इसी प्रकार,

संस्कार परिष्कृत,

होते जाएंगे।


अन्यत्र यह,

शिक्षा मिलेगी नहीं ,

बच्चों को कभी।


हानि नहीं है,

जब भी सीख सके,

कोई इसको।

Thursday, August 4, 2022

कुत्ते की पूँछ

 कुत्ते की पूँछ,

में क्या बुराई होती,

आओ समझें।


कटे बिना वो,

सीधी हो ही न सके,

जीवन भर।


नहीं दिखती,

अपनी कोई बुराई,

किसी को भी।


लगे अच्छी ही,

हमें वह हमेशा,

यही समस्या।


ज़िद क्रोध भी,

हमें नहीं छोड़ते,

ठीक वैसे ही।


नहीं सुनते,

हम बात किसी की,

अहंकार में।


टोंकने पर,

और ज़िद बढ़ती,

बुरी तरह।


समझाना भी,

ज़हर सा लगता,

अपनों का भी।


अंत में हम,

रह जाते अकेले,

दुःखी उदास।


जब भी इसे,

समझ लेंगे हम,

सुख बढेगा।


बुढ़ापे में तो,

इसे बदल पाना,

असंभव है।


अच्छा यही है,

इसे जल्दी समझें,

अपने आप।


बच्चे तो बस,

सीखेंगे हमसे ही,

अच्छा या बुरा।


निर्णय जो भी,

हमारे होंगे आज,

कल दिखेंगे।


पछतावे से,

मिलेगा कुछ नहीं,

हमें बाद में।

Sunday, July 24, 2022

दूर के ढोल

 आज लिखे हैं 🥰


दूर के ढोल,

ही क्यों सुहाने लगें,

चलो समझें।


फूलों के भी तो,

कांटे यों ही दिखते,

पास आने से!


गुण दोष भी,

लोगों के हैं दिखते,

निकटता में।


किन्तु अक्सर,

तब दोष ही ज़्यादा,

स्पष्ट दिखते!


घृणा क्रोध भी,

प्रबल हो जाते हैं,

ऐसे समय।


मिट सी जातीं,

अच्छाइयाँ उनकी,

न जाने कैसे?


नहीं दिखता,

स्थाई समाधान भी,

सरल कोई।


अनायास ही,

निंदनीय शब्द भी,

कहे जाते हैं।


प्रेम ही होता,

उनका मूल सदा,

पीड़ा ज़्यादा दें।


हाल यही है,

सभी परिवारों का,

विश्व भर में!


जादू मन्त्र क्या,

कुछ कर पाएंगे,

चमत्कार सा!


प्रवचन भी,

कुछ प्रभावी होंगे,

क्या यहाँ पर?


मुश्किल होता,

रोकना संवेगों को,

न दुसाध्य भी!


स्वयं हमें ही,

हल खोजना होगा,

अंतर्मन में।


बस केवल,

आत्मावलोकन ही,

शक्ति स्त्रोत्र है।


बढ़ानी होगी,

संवाद प्रवीणता,

हमें सदा ही।


कर के देखें,

लगन नियम से,

कुछ दिन तो!


यदि ज़रा भी,

प्रसन्नता मिले तो,

दुजों से बाँटें।

Tuesday, July 12, 2022

आज पिता के बारे में

 पिता महिमा

अति अल्प वर्णित 

श्रेष्ठ अत्यंत 


उसकी निष्ठां

निज संतति हेतु

अतुल्य सदा


चुप रहे वो

सामान्य बातों पर

नहीं अन्यथा


माँ से उच्च

है धैर्यवान पिता

बच्चे न मानें


ढाल है वही

पूरे कुटुंब की भी

जीवन भर


क्रोध उसका

विकट होता शीघ्र

पर क्षणिक 


हिंसक भी वो

हो ही जाता है तभी

किन्तु मोह में 


प्रेम न कभी

उसका घटता है

अपितु बढे


सीखता रहे

नित प्यार की कला

अर्धांगिनी से


उम्र के साथ

वह निखरता है

कंचन सम


प्रौढ़ होने पे

लगता वो क्षीण है 

स्नेह न घटे 


राय उसकी

असह्य तो लगती

बिन माँगे पे 


जान ही लेते 

इस मर्म को सभी

बड़े होकर 


काश ये ज्ञान

मिल सके शिशु को 

शैशव में ही


शिक्षा यह भी 

प्रारम्भ होनी चाहिए

हर स्कूल में 


तभी तो होगा

सर्वांगीण विकास

पूरे विश्व का


इसके लिए

केवल सनातन 

ही सक्षम है


Saturday, May 28, 2022

लिपि का महत्त्व

  भारत एक बहुत बड़ा देश है और सैकड़ों साल से हम सुनते चले आ रहे हैं की बोली अलग-अलग जगहों पर बदलती रहती है।


 1835 में लॉर्ड मैकाले ने अपने देश की इसी विविधता को एक कमी की तरह से दिखाकर इंग्लिश लैंग्वेज में पढ़ाई को अनिवार्य व आकर्षक कर दिया।


 इस छोटी सी दिखने वाली योजना से मैकाले ने किस तरह से हमारी मानसिकता को गुलाम बना दिया और हमारे पीढ़ियों को अपनी संस्कृति से दूर  कर दिया। और हम अपनी विरासत को भी भूलकर, काफ़ी  हद तक उसे दकियानुसी, अंधविश्वास व फिज़ूल समझने लगे।



 इसके विपरीत विश्व के अधिकांश देशों में अलग- भाषाओं के लिए केवल एक ही लिपि का प्रयोग किया जाता है। अधिकांश भाषाओं के लिए तो इंग्लिश की रोमन लिपि ही प्रयोग हो रही है।


यद्यपि इस लिपि में बहुत सारी कमियाँ हैँ, लेकिन कोई और विकल्प न होने के कारण ये मज़बूरी में चलती जा रही है।


इसके विपरीत देवनागरी लिपि अपनी ध्वनि सम्मत  विशेषताओ के आधार पर, पूरे विश्व की प्रत्येक भाषा को यथावत लिखने व पढ़ने में सर्वोत्तम है।


आज भी हमारे राजनीतिज्ञ अपने क्षेत्रीय फायदों को सर्वोपरि मानते हैँ। वे अपनी भाषा के साथ ही लिपि को भी यथावत  बनाए रखने की होड़ में लगे हुए हैँ।


इस विषय पर एक बड़ा लम्बा शोधपारक लेख इंटरनेट पर पढ़ने को मिला है। उसका लिंक नीचे  दे रहा हूँ।


https://scroll.in/magazine/821605/thomas-macaulay-and-the-debate-over-english-education-in-india


समस्त राष्ट्रवादी सोच रखने वाले नागरिकों से सविनय अनुरोध है कि वे इसे पूरा पढ़कर विचार करें कि कैसे हमारी भावी पीढ़ियों को apni-2 भाषाओं को एक ही लिपि में पढ़ने लिखने के लिए तैयार कर सकते हैँ।


इस ब्लॉग के विषय को अधिक से अधिक माध्यमों से शेयर व प्रसारित भी करते रहें।