हे पुरुष!
क्यों दमन करता तू, ठहर,
माँ है वो तेरी संतति की।
क्या नहीं ये संतान पर कहर?
हे पुरुष, देख-समझ
बल-पुरुषार्थ रहे घर के बाहर,
यहाँ काम आता बस प्रेम और आदर।
कौन कभी चाहे डाँट और डपट?
हे पुरुष, देख-समझ
घर के काम करें मिलजुल,
कौन कभी चाहे डाँट और डपट?
हे पुरुष, देख-समझ
घर के काम करें मिलजुल,
कोना-कोना हो जगमग-झिलमिल.
क्या नहीं तेरा भी यही अरमान?
हे पुरुष, देख-समझ
बच्चे-बड़े चाहें बस सम्मान-समता,
क्या नहीं तेरा भी यही अरमान?
हे पुरुष, देख-समझ
बच्चे-बड़े चाहें बस सम्मान-समता,
है यही घर-समाज की शान.
क्या नहीं तेरा ही ये दायित्व?
हे पुरुष, देख-समझ
'बेदिल' बदायूंनी - 05/08/2018.
हे पुरुष, देख-समझ
'बेदिल' बदायूंनी - 05/08/2018.