Thursday, September 15, 2022

सामंजस्य

सामंजस्य

स्वयं को जानें,
हम पहले पूरा,
तभी दूजों को.

अपने दोष,
जब समझ लेंगे,
प्रसन्न होंगे.

दोष तो होते,
भिन्न सभी में सदा,
दिखें दूजों के.

इच्छा दूजे को,
बदलने की देती,
जन्म दुखों को.

प्रेम राग में,
अधिपत्य नहीं हो,
बदलने का.

स्वीकार करें,
सभी को यथावत,
परिवार में.

तभी बढ़ेगा,
परस्पर प्रेम मान,
सब के बीच.

अन्यथा होगी,
संवाद शून्यता ही,
प्रखर वहाँ.

सुनने वाला,
मान रहा है यही,
महत्वपूर्ण.

सुनें ज़्यादा व,
बोलें कम ही तोल,
यही सिद्धांत.

मतभेदों को,
निजता प्रेम से ही,
सुलझा सकें.

न हो उनमें,
क्रोध व अपमान,
कभी किसी का.

राय दूजे की,
भी सही हो सकती,
ये सोचा करें.

Sunday, September 11, 2022

ख़ुशनुमाँ ही

*ख़ुशनुमाँ ही*

महफ़िल थी,
वो बड़ी ख़ुशनुमाँ,
सब बुड्ढे थे.

मैं पापा दादी,
मम्मी बहन सँग,
हँस रहे थे.

बुआ थीं ख़ास,
बस एक ही प्यारी,
बाक़ी फ़र्क़ थीं.

उनका प्यार,
प्यार ही था अलग,
सबसे जुदा.

बाक़ी सभी की,
कई अलग बातें,
चुभती सी थीं.

भाभी भी एक,
थीं सबसे अलग,
माँ की ही जैसी.

बात साली की,
कैसे कोई भूलेगा,
खिलती कली.

छोटा भाई तो,
बेटे जैसा ही लगा,
बड़ा हो के भी.

बेटा तो मुझे,
बिल्कुल अपना ही,
साया सा लगा.

पत्नी के बाद,
बेटी बहू दोनों ने,
कमी न छोड़ी.

यादो में थी वो,
सभी की वैसी सच्ची,
मुस्कान लिए.

शायद उसे,
मोक्ष ही मिल गया,
तभी नहीं थी.

मस्त थे सभी,
दामाद जीजा तक,
बेफ़िक्र होके.

बातें सबको,
एक दूजे की सभी,
भा भी रहीं थीं.

होली के जैसे,
एक रंग में रंगे,
हुए थे सब.

Friday, September 9, 2022

पीढ़ी अन्तर?

 देखा ख़्वाब क्या,

कल रात अजीब,

हक़ीक़त सा.


सभी के बीच,

पिता के बाल सखा,

सँग मैं भी था.


मान व डर,

में क्या होता प्रमुख,

पिता पुत्र में?


यही था चर्चा,

का मौलिक विषय,

तीनों के बीच.


उन्होंने कहा,

मान, किन्तु डर था,

मेरा कहना.


कुछ देर में,

वे भी समझ गए,

मेरी बातों को.


उन्होंने कहा,

उन्हें ऐसा व्यवहार 

मिला जन्म से.


और वो बनी,

उनकी भी आदत,

बड़े होकर.


तभी ये सोचा,

क्या मैं कुछ सुधरा,

जीवन भर!


पीढ़ियों से ही,

ये आदत बढ़ती,

चली जा रही.


बच्चे भी ढीठ,

बड़े होते जा रहे,

उत्तरोत्तर.


सुनते तो हैं,

वो सारी बातें किन्तु,

करें मन की!


परिवारों में,

बढ़ती जा रही है,

अदृश्य दूरी.


मनन भी है,

बड़ा ज़रूरी यहाँ,

निर्णय पूर्व.


रोकना होगा,

इस विघटन को,

सूझ बूझ से.

Monday, September 5, 2022

जीवन मर्म

 जीवन मर्म

=-=-=-=-=

सफ़र ही है,

मनुष्य का जीवन,

भिन्न सभी का.


होता यह है,

नाव के जैसा किन्तु,

दिखे समान.


सारी ही नावें,

एक जैसी तो दिखें,

पर होती नहीं हैं.


नाव व्यक्ति है,

संसार नदी समान,

शुरुआत में.


आस्था व विश्वास,

दो पतवार होते,

इस नाव के.


धैर्य व निष्ठा,

बाहुओं के समान,

उन्हें चलाते.


मन होता है,

चंचल हवाओं सा,

हो डगमग.


संस्कार होते,

हैं मार्गदर्शक ही,

कम्पास जैसे.


विवाह तक,

कागज़ की सी नावें,

मज़े से चलें.


किन्तु बाद में,

उसमें ज़्यादा जगह,

चाहिए होती.


जीवन साथी,

बने सहनाविक,

उसके बाद.


लक्ष्य भी तभी,

तय किए जाते हैं,

मिल जुल के.


और नदी भी,

हो जाती सागर सी,

लहरों सँग.


फिर उसमें,

बच्चे भी सवार होते,

कालांतर में.


हिचकोले तो,

नाव में आते रहते,

हर समय.


किन्तु गृहस्थी,

की कई उलझनें,

तूफ़ान लातीं.


कठिन होता,

उनसे निबटना,

किसी एक को.


दंपत्ति होते,

पूरक परस्पर,

न प्रति रूप.


आवश्यक हैं,

भिन्नताएं मतों की,

उनके बीच.


आगे के रास्ते,

में समन्वय ही तो,

प्रगति लाता.


निर्णय सारे,

धैर्यपूर्वक होवें,

सम्मति से ही.


भव सागर,

बिन साथी या गुरु,

पार न होवे.


सीखें ये मर्म,

शीघ्र ही सारे युवा,

कल्याण हेतु.❤️👏🥰

Friday, September 2, 2022

आज दाम्पत्य पर

 आज दाम्पत्य पर,


विदेशों में तो,

पत्नी बच्चे न कुछ,

भी माने जाते.


किन्तु यहाँ पे,

मुखिया माने उन्हें,

संपत्ति जैसा.


वहाँ अति है,

उन्मुक्तता की यदि,

यहाँ मूकता.


निर्णय सारे,

वहाँ फ़ौरी ही होते,

यहाँ आदेश.


वहाँ यौन भी,

उन्मुक्त विवाह परे,

यहाँ कुंठित.


तलाक़ वहाँ,

बड़ी सामान्य बात,

यहाँ घुटन.


शादियाँ वहाँ,

होती टूटती रहें,

मन मर्ज़ी से.


यहाँ करते,

बुज़ुर्ग ही फ़ैसला,

बस स्वयं ही.


राय बच्चों की,

ली न माँगी जाती,

किसी घर में.


भावनाओं का,

वहाँ स्थान न कोई,

जीवन भर.


शादी निभाना,

यहाँ प्रतिबद्धता,

कठोर होती.


भावावेश ही,

यहाँ कारण बनें,

सभी दुखों के.


हिंसा तो बड़ी,

सर्व व्यापी हो चुकी,

वहाँ यहाँ भी.


अभाव बड़ा,

है दोनों ही तरफ़,

सौम्यता का तो.


शिक्षा न कोई,

दी जाती है कभी भी, 

कहीं इस की.


वहाँ की नारी,

उन्मुक्त बराबरी,

ही चाहती है.


भरी यहाँ की,

शील संस्कारों सँग,

सबको भाती.


धैर्य उसका,

चट्टानों को लजाता,

अति श्रेष्ठ वो.


इसी कारण,

विदेशी भी चाहते,

शादी उससे.


किन्तु फिर भी,

मूल्य नहीं समझें,

पुरुष यहाँ.


बच्चे व घर,

नारी ही सम्हालती,

श्रेय लें नर.


भ्रम यही तो,

चलता यूँ रहता,

जीवन भर.


जिस दिन भी,

पुरुष ये समझें,

समृद्धि होगी.


ईश्वर करें,

वो दिन जल्द आए,

पूरे विश्व में.