"[कविता] - ले. कर्नल अनूप कुमार सक्सेना (रिटायर्ड)
*अजी सुनती हो?*
हाँ, सुनती हूँ बिलकुल,
न चाहते हुए भी, आदत सी पड़ चुकी है,
जन्म से आज तक, है कोई - विकल्प क्या?
इसी कारण - शायद,
प्राप्त है तुम्हें,
बस, अपनी ही कहने का अधिकार!
हा! बृह्म-पुरुष ने भी,
रचीं बस देवियाँ ही,
क्यों नहीं नारी?
पुराणों ने भी किया,
महिमा-मंडन पतिव्रता का,
स्त्री का अस्तित्व, महत्त्व, निमित्त?
आदेश-निर्देश, तुम्हारा क्षेत्र,
मानते जाना, मेरी मर्यादा,
कहाँ है कुछ, पूछने, समझने, या प्रश्न की बात?
स्वीकार्यता-सम्पूर्णता, बस तुम्हारे साथ,
प्रदान ही करते रहना, सदा सहवास,
मेरी स्थिति, इच्छाओं का उपहास?
राम-रावण, कृष्ण-कंस, दुर्वासा ने भी,
नहीं किया स्त्री का आदर-विश्वास,
क्यों रहो फिर प्रिय, तुम ही अपवाद?
शिक्षा-समानता के नारे,
बस लगते बाहर ही अच्छे,
पर अपनी माँ, बहन, बेटी और पत्नी?
शरीर ही जिसका अभीष्ठ,
असम्भव, प्रकृति में उसकी कोई और बात,
लालन-पालन, संस्कारिता, कहाँ है अवकाश?
न, न, न, सुन रही हूँ पूरे ध्यान से,
लगातार, तुम्हारी हर बात,
पता नहीं कहाँ से, आ गए यह दबे से कुछ, -.- खयालात!"
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