Tuesday, October 6, 2020

अजी सुनती हो

 "[कविता]  - ले. कर्नल अनूप कुमार सक्सेना (रिटायर्ड)


*अजी सुनती हो?*


हाँ, सुनती हूँ बिलकुल,

न चाहते हुए भी, आदत सी पड़ चुकी है,

जन्म से आज तक, है कोई - विकल्प क्या?


इसी कारण - शायद,

प्राप्त है तुम्हें,

बस, अपनी ही कहने का अधिकार!


हा! बृह्म-पुरुष ने भी,

रचीं बस देवियाँ ही,

क्यों नहीं नारी?


पुराणों ने भी किया,

महिमा-मंडन पतिव्रता का,

स्त्री का अस्तित्व, महत्त्व, निमित्त?


आदेश-निर्देश, तुम्हारा क्षेत्र,

मानते जाना, मेरी मर्यादा,

कहाँ है कुछ, पूछने, समझने, या प्रश्न की बात?


स्वीकार्यता-सम्पूर्णता, बस तुम्हारे साथ,

प्रदान ही करते रहना, सदा सहवास,

मेरी स्थिति, इच्छाओं का उपहास?


राम-रावण, कृष्ण-कंस, दुर्वासा ने भी,

नहीं किया स्त्री का आदर-विश्वास,

क्यों रहो फिर प्रिय, तुम ही अपवाद?


शिक्षा-समानता के नारे,  

बस लगते बाहर ही अच्छे,

पर अपनी माँ, बहन, बेटी और पत्नी?


शरीर ही जिसका अभीष्ठ,

असम्भव, प्रकृति में उसकी कोई और बात,

लालन-पालन, संस्कारिता, कहाँ है अवकाश?


न, न, न, सुन रही हूँ पूरे ध्यान से,

लगातार, तुम्हारी हर बात,

पता नहीं कहाँ से, आ गए यह दबे से कुछ, -.- खयालात!"




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