स्थितप्रज्ञ हों
लगातार प्रयत्न
करते रहें
इस दिशा में
जानना शुरू करें
बचपन से
बदलें उसे
जो है अपने वश
अन्यथा मानें
विवेकशील
होकर अध्ययन
करना सीखें
अपेक्षा और
इच्छा सीमित रखें
श्रम अधिक
स्नेह फैलाएं
क्रोध करें वश में
निरन्तर ही
शिक्षा कम दें
स्वयम कर सिखाएं
प्रगति करें
भूल किसी की
भी सदा क्षमा करें
स्नेह ही देवें
आयु बढ़े तो
साहस-धैर्य बढ़े
लालसा घटे
अपेक्षा कम
करना ही सीखिए
किसी और से
अपने साथ
रहना भी सीखिए
कुछ समय
सुख संतोष
मन के अन्दर ही
न कहीं और
बिना आपकी
स्वीकृति असंभव
अपमान भी
व्यर्थ है चिंता
लोग क्या कहेंगे की
मस्त रहिए
स्वर्ग भी यहीं
पा सकते हैं हम
निर्लिप्त बन
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