Sunday, July 24, 2022

दूर के ढोल

 आज लिखे हैं 🥰


दूर के ढोल,

ही क्यों सुहाने लगें,

चलो समझें।


फूलों के भी तो,

कांटे यों ही दिखते,

पास आने से!


गुण दोष भी,

लोगों के हैं दिखते,

निकटता में।


किन्तु अक्सर,

तब दोष ही ज़्यादा,

स्पष्ट दिखते!


घृणा क्रोध भी,

प्रबल हो जाते हैं,

ऐसे समय।


मिट सी जातीं,

अच्छाइयाँ उनकी,

न जाने कैसे?


नहीं दिखता,

स्थाई समाधान भी,

सरल कोई।


अनायास ही,

निंदनीय शब्द भी,

कहे जाते हैं।


प्रेम ही होता,

उनका मूल सदा,

पीड़ा ज़्यादा दें।


हाल यही है,

सभी परिवारों का,

विश्व भर में!


जादू मन्त्र क्या,

कुछ कर पाएंगे,

चमत्कार सा!


प्रवचन भी,

कुछ प्रभावी होंगे,

क्या यहाँ पर?


मुश्किल होता,

रोकना संवेगों को,

न दुसाध्य भी!


स्वयं हमें ही,

हल खोजना होगा,

अंतर्मन में।


बस केवल,

आत्मावलोकन ही,

शक्ति स्त्रोत्र है।


बढ़ानी होगी,

संवाद प्रवीणता,

हमें सदा ही।


कर के देखें,

लगन नियम से,

कुछ दिन तो!


यदि ज़रा भी,

प्रसन्नता मिले तो,

दुजों से बाँटें।

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