Wednesday, August 24, 2022

दिल दिमाग़ का फ़र्क़

 फ़र्क़ समझें,

दिल व दिमाग़ का,

अच्छी तरह.


विज्ञान ने तो,

इनकी रचना ही,

समझाई है.


क्या कोई और,

भावनात्मक पक्ष,

भी हैं इनके?


भिन्न कुछ क्या,

उनके अपने ही,

नियंत्रण हैं?


बड़ा कौन है,

दिमाग़ दिल में,

ये समझना.


दिल करता,

संचालित सारे ही,

अंग हमेशा.


मन तक भी,

सुनता है पहले,

दिल की बात.


सफ़लता भी,

किसी काम में मिले,

मनोयोग से.


मनोयोग को,

ही और समझेंगे,

अब फिर से.


जिस काम में,

मन नहीं लगता,

वही टलता.


प्यार भी होता,

है बस दिल से ही,

न दिमाग़ से.


अच्छा या बुरा,

भी तय करता है,

दिल ही सदा.


यादों तक में,

दिल से उतर के,

कोई न रहे.


सफ़लता भी,

दिल लगा के किए,

कार्यों से मिले.


बदला लेना,

तो दिमाग़ चाहता,

न कभी दिल.


चैन न मिले,

बिना बदला लिए,

पल भर को.


ज़िद भी आती,

दिमाग़ में पहले,

किसी बात की.


आक्रोश भी तो,

दिमाग़ बिगाड़ता,

बुरी तरह.


रास्ते ग़लत,

भी दिमाग़ दिखाता,

हमें पहले.


मज़बूरी में,

साथ देना पड़ता,

है दिल को भी.


फिर भी दिल,

बेचैन रहता है,

आशंकाओं से.


ऐसे में हमें,

ध्यान देना चाहिए,

ज़्यादा सोच पे.


नुक्सान ज़्यादा,

ख़ुद को ही देता है,

क्रोध-बदला.


दिमाग़ की ही,

सदा सुनने वाला,

भटकता है.


इसी लिए तो,

सुननी ही चाहिए,

बात दिल की.


ईश्वर भी तो,

रहते दिल में ही,

हम सभी के.

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