*ख़ुशनुमाँ ही*
महफ़िल थी,
वो बड़ी ख़ुशनुमाँ,
सब बुड्ढे थे.
मैं पापा दादी,
मम्मी बहन सँग,
हँस रहे थे.
बुआ थीं ख़ास,
बस एक ही प्यारी,
बाक़ी फ़र्क़ थीं.
उनका प्यार,
प्यार ही था अलग,
सबसे जुदा.
बाक़ी सभी की,
कई अलग बातें,
चुभती सी थीं.
भाभी भी एक,
थीं सबसे अलग,
माँ की ही जैसी.
बात साली की,
कैसे कोई भूलेगा,
खिलती कली.
छोटा भाई तो,
बेटे जैसा ही लगा,
बड़ा हो के भी.
बेटा तो मुझे,
बिल्कुल अपना ही,
साया सा लगा.
पत्नी के बाद,
बेटी बहू दोनों ने,
कमी न छोड़ी.
यादो में थी वो,
सभी की वैसी सच्ची,
मुस्कान लिए.
शायद उसे,
मोक्ष ही मिल गया,
तभी नहीं थी.
मस्त थे सभी,
दामाद जीजा तक,
बेफ़िक्र होके.
बातें सबको,
एक दूजे की सभी,
भा भी रहीं थीं.
होली के जैसे,
एक रंग में रंगे,
हुए थे सब.
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