जीवन मर्म
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सफ़र ही है,
मनुष्य का जीवन,
भिन्न सभी का.
होता यह है,
नाव के जैसा किन्तु,
दिखे समान.
सारी ही नावें,
एक जैसी तो दिखें,
पर होती नहीं हैं.
नाव व्यक्ति है,
संसार नदी समान,
शुरुआत में.
आस्था व विश्वास,
दो पतवार होते,
इस नाव के.
धैर्य व निष्ठा,
बाहुओं के समान,
उन्हें चलाते.
मन होता है,
चंचल हवाओं सा,
हो डगमग.
संस्कार होते,
हैं मार्गदर्शक ही,
कम्पास जैसे.
विवाह तक,
कागज़ की सी नावें,
मज़े से चलें.
किन्तु बाद में,
उसमें ज़्यादा जगह,
चाहिए होती.
जीवन साथी,
बने सहनाविक,
उसके बाद.
लक्ष्य भी तभी,
तय किए जाते हैं,
मिल जुल के.
और नदी भी,
हो जाती सागर सी,
लहरों सँग.
फिर उसमें,
बच्चे भी सवार होते,
कालांतर में.
हिचकोले तो,
नाव में आते रहते,
हर समय.
किन्तु गृहस्थी,
की कई उलझनें,
तूफ़ान लातीं.
कठिन होता,
उनसे निबटना,
किसी एक को.
दंपत्ति होते,
पूरक परस्पर,
न प्रति रूप.
आवश्यक हैं,
भिन्नताएं मतों की,
उनके बीच.
आगे के रास्ते,
में समन्वय ही तो,
प्रगति लाता.
निर्णय सारे,
धैर्यपूर्वक होवें,
सम्मति से ही.
भव सागर,
बिन साथी या गुरु,
पार न होवे.
सीखें ये मर्म,
शीघ्र ही सारे युवा,
कल्याण हेतु.❤️👏🥰
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