Friday, September 2, 2022

आज दाम्पत्य पर

 आज दाम्पत्य पर,


विदेशों में तो,

पत्नी बच्चे न कुछ,

भी माने जाते.


किन्तु यहाँ पे,

मुखिया माने उन्हें,

संपत्ति जैसा.


वहाँ अति है,

उन्मुक्तता की यदि,

यहाँ मूकता.


निर्णय सारे,

वहाँ फ़ौरी ही होते,

यहाँ आदेश.


वहाँ यौन भी,

उन्मुक्त विवाह परे,

यहाँ कुंठित.


तलाक़ वहाँ,

बड़ी सामान्य बात,

यहाँ घुटन.


शादियाँ वहाँ,

होती टूटती रहें,

मन मर्ज़ी से.


यहाँ करते,

बुज़ुर्ग ही फ़ैसला,

बस स्वयं ही.


राय बच्चों की,

ली न माँगी जाती,

किसी घर में.


भावनाओं का,

वहाँ स्थान न कोई,

जीवन भर.


शादी निभाना,

यहाँ प्रतिबद्धता,

कठोर होती.


भावावेश ही,

यहाँ कारण बनें,

सभी दुखों के.


हिंसा तो बड़ी,

सर्व व्यापी हो चुकी,

वहाँ यहाँ भी.


अभाव बड़ा,

है दोनों ही तरफ़,

सौम्यता का तो.


शिक्षा न कोई,

दी जाती है कभी भी, 

कहीं इस की.


वहाँ की नारी,

उन्मुक्त बराबरी,

ही चाहती है.


भरी यहाँ की,

शील संस्कारों सँग,

सबको भाती.


धैर्य उसका,

चट्टानों को लजाता,

अति श्रेष्ठ वो.


इसी कारण,

विदेशी भी चाहते,

शादी उससे.


किन्तु फिर भी,

मूल्य नहीं समझें,

पुरुष यहाँ.


बच्चे व घर,

नारी ही सम्हालती,

श्रेय लें नर.


भ्रम यही तो,

चलता यूँ रहता,

जीवन भर.


जिस दिन भी,

पुरुष ये समझें,

समृद्धि होगी.


ईश्वर करें,

वो दिन जल्द आए,

पूरे विश्व में.

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