सामंजस्य
स्वयं को जानें,
हम पहले पूरा,
तभी दूजों को.
अपने दोष,
जब समझ लेंगे,
प्रसन्न होंगे.
दोष तो होते,
भिन्न सभी में सदा,
दिखें दूजों के.
इच्छा दूजे को,
बदलने की देती,
जन्म दुखों को.
प्रेम राग में,
अधिपत्य नहीं हो,
बदलने का.
स्वीकार करें,
सभी को यथावत,
परिवार में.
तभी बढ़ेगा,
परस्पर प्रेम मान,
सब के बीच.
अन्यथा होगी,
संवाद शून्यता ही,
प्रखर वहाँ.
सुनने वाला,
मान रहा है यही,
महत्वपूर्ण.
सुनें ज़्यादा व,
बोलें कम ही तोल,
यही सिद्धांत.
मतभेदों को,
निजता प्रेम से ही,
सुलझा सकें.
न हो उनमें,
क्रोध व अपमान,
कभी किसी का.
राय दूजे की,
भी सही हो सकती,
ये सोचा करें.
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